भाषण : सान्ताक्रूज, बम्बई में १९५ हो तुम्हें अपना व्यक्तित्व अवश्य कायम रखना चाहिए। जहाँ आवश्यक हो, मेरी बात तुम्हें नहीं माननी चाहिए, क्योंकि यह सम्भव है कि तुम्हारे प्रति पूरा प्रेम होनेपर भी मैं तुम्हारे बारेमें गलत खयाल बना लूं। मैं नहीं चाहता कि तुम यह समझो कि मुझसे कभी भूल हो ही नहीं सकती । [कार्यक्रम ] सस्नेह, तुम्हारा, बापू [ पुनश्च : ] तुम रुपया और चैक नहीं ले गईं। वह तुम्हारे पास भेज दिया गया है । अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२११) से । सौजन्य : मीराबहन १८१. भाषण : सान्ताक्रूज, बम्बई में ' २३ मार्च, १९२७ गांधीजीने सभामें अपनी जगहपर बैठे-बैठे ही गुजरातीमें भाषण देना शुरू किया, जब कि उनसे हिन्दीमें भाषण देनेका अनुरोध किया गया था, क्योंकि सभामें बहुतसे मद्रासी और ऐसे अन्य व्यक्ति उपस्थित थे, जिन्हें गुजराती नहीं आती थी । गांधीजीने मत लिया और बहुमतकी इच्छानुसार गुजरातीमें भाषण देना शुरू किया । लेकिन अल्पमतवालोंको उन्होंने विश्वास दिलाया कि उन लोगोंके हककी उपेक्षा नहीं की जायेगी। उन्होंने कहा : श्री जे० के० मेहताको जिस चीजकी आशंका है उसका कारण काफी हदतक सही है । सान्ताक्रूजमें छः साल पहले दी गई और आज दी गई रकममें जो इतना अधिक अन्तर है उसपर अहिंसाको अपना सिद्धान्त माननेवाला कोई व्यक्ति जितनी करारी चोट कर सकता है, में आज उतनी करारी चोट करनेवाला हूँ । श्री मेहताके साग्रह आमन्त्रणपर ही मैं रिवाड़ी, जहाँ जाना पहले तय हो चुका था, जानेके बजाय यहाँ आया। आप शायद जानते हैं कि यद्यपि मैं शहरोंकी उपेक्षा नहीं कर रहा हूँ, फिर भी आजकल में बहुधा गाँवोंमें ज्यादा जाता हूँ, क्योंकि भारत अपने मुट्ठीभर १. दौरेके कार्यक्रमके लिए देखिए " पत्र : क्षितीशचन्द्र दासगुप्तको ", १४-३-१९२७ । २. बम्बई उपनगर जिला कांग्रेस कमेटीके प्रधान, जयसुखलाल के० मेहता द्वारा दिये गये स्वागत- भाषण के उत्तर में । ३. छः साल पहले दिये गये ५२,००० रुपयोंकी तुलना में इस सभामें गांधीजीको केवल ३,००० रुपये दिये गये थे । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३३
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