१९६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय शहरोंमें नहीं; अपितु अपने गाँवोंमें वास करता है । वहाँ भी ३,००० रुपये इकट्ठा करना कोई कठिन काम नहीं है। आपको शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि मेरे पिछले दौरेमें महाराष्ट्र और बिहारके गाँवोंने सवा-सवा लाख रुपया चन्दा दिया था । गाँवोंमें भी खादीका खूब तेजीसे और बड़ी दूरतक प्रचार हो रहा है। बावजूद ऐसी उल्टी-सीधी तमाम फवावाहोंके कि खादीका नामोनिशान मिट गया है; में आँकड़े देकर सिद्ध कर सकता हूँ कि १९२० में जब आन्दोलन आरम्भ ही हुआ था जितनी खादी तैयार होती थी, उससे बीस गुना ज्यादा आज तैयार की जा रही है । १९२६ में कमसे कम बीस लाखकी खादी तैयार की गई और देशके १,५०० गाँवोंमें रहनेवाली कमसे कम ५०,००० स्त्रियोंको कताईका काम दिया गया, जिसके लिए उन्हें नौ लाख रुपये से ज्यादा पारिश्रमिकमें दिये गये। फिर भी यह स्थिति पूर्णतया सन्तोषजनक नहीं है। उससे में सन्तुष्ट नहीं हूँ। मैंने देखा है कि बम्बई और दूसरे शहरोंमें बहुत कम लोग खादी पहनते हैं । १९२१ में बम्बईकी हालत आजकी हालतसे विलकुल भिन्न थी । खद्दरके बारेमें इस ढिलाईके में दो ही कारण सोच सकता हूँ या तो यह कि जो लोग पहले खादी पहनते थे, उनकी खादीके सम्बन्धमें राय अब बदल गई है या फिर यह कि वे १९२१ में ढोंग कर रहे थे । यद्यपि असहयोग या हिन्दू-मुस्लिम एकताके विषयमें कुछ कहने का यह अवसर नहीं है, लेकिन मुझे साफ-साफ कह देना चाहिए कि इन दोनों चीजोंमें मेरा पहले जैसा ही दृढ़ और अत्यधिक विश्वास है। बल्कि मुझे यह कहना चाहिए कि पहलेसे भी ज्यादा हो गया है। यदि मैं उस तरहका स्वराज्य चाहता हूँ, जिसके लिए मैं पिछले कुछ वर्षोंसे संघर्ष कर रहा हूँ, तो मैं ऐसा महसूस करनेको विवश हूँ कि हिन्दू- मुस्लिम एकता उसके लिए निहायत जरूरी है । परन्तु मानव-प्रकृतिके एक पारखीके रूपमें मैंने पाया है कि पूरा वातावरण ही बदल गया है। लेकिन खादीके साथ ऐसी बात नहीं है; खादी-कार्यका परिणाम निराशाजनक नहीं है। मैंने पाया है कि लोग उससे ऊबे नहीं हैं। और इसके लिए हमें समाचारपत्रोंपर निर्भर रहनेकी जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि समाचारपत्र सिर्फ शहरोंमें ही पढ़े जाते हैं। हरिद्वारमें कोई समाचारपत्र नहीं है, फिर भी वहाँ आसानीसे दो लाख रुपये जमा हो गये । वह स्थान इस बम्बई जैसा नहीं है, जो मुझे तो इंग्लैंडकी एक प्रशाखा जैसा लगता है । मैं आजकल जो धन एकत्र कर रहा हूँ, वह उस अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक कोषमें जमा किया जाता है और यह ग्राम-संगठन कार्यमें खर्च किया जायेगा । गाँवोंका पूर्ण रूपसे संगठन ही स्वर्गीय देशबन्धुका उपयुक्त स्मारक होगा। मैं कह सकता हूँ कि भारतके गाँवोंके संगठनका उपाय चरखा ही है। मैं आपको सूरत जिलेकी रानीपरज जातिका उदाहरण दे सकता हूँ, जहाँ चरखेके सन्देश द्वारा लगभग १०४ गाँवोंमें रहनेवाले रानीपरज लोगोंको पूरी तरह संगठित किया गया है। रानी- परज जातिकी अनपढ़ स्त्रियोंने भारी गहने पहनना छोड़ दिया है और स्त्री, पुरुष, बच्चे सभी शुद्ध खादी पहनते हैं। ऐसी जातियों और गाँवोंमें काम करनेके लिए धनकी जरूरत है। में भारतके लाखों निर्धन लोगोंका स्वयं नियुक्त वकील हूँ और Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३४
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