२०४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय कायम है। अब यह हमपर निर्भर है कि हम जब चाहें आगे कदम उठायें। [लोगोंके मनसे ] सरकारका भय तो सदाके लिए समाप्त हो गया है। लोगोंकी सामान्य राय यही है कि आप कामरेड सकलातवालाको जरा ज्यादा ब्यौरेवार जवाब देते । क्या आप उन्हें इस बारेमें कुछ और जवाब देनेवाले हैं ? मेरी राय में तो मैंने उन्हें उपयुक्त जवाब दे दिया है। मैं हर बातका विवेचन विस्तारसे नहीं कर सका। लेकिन अगर मेरा जवाब कहीं स्पष्ट न हो तो मैं सब भ्रम दूर करनेको तैयार हूँ । आपने अपने जवाब में कहा है कि मजदूरोंका संगठन करनेके आपके अपने अलग तरीके हैं। क्या आप अपनी बात कुछ और स्पष्ट करेंगे ? हाँ, मैं मजदूरोंका संगठन उनके अपने प्रयत्नों द्वारा कराऊँगा । मैं उनमें पूँजीके प्रति असन्तोषकी भावना उतनी नहीं, जितनी कि स्वयं अपने प्रति असन्तोषकी भावना भरना चाहूँगा। मैं चाहता हूँ कि पूंजी और श्रमके बीच सच्चा सहयोग हो । मैं मजदूरों को यकीन दिलाऊँगा कि बहुतसे मामलों में दोष पूँजीपतियोंका नहीं, उनका अपना है । राजनैतिक आन्दोलनकी तरह मजदूरोंके आन्दोलनमें भी में आन्तरिक सुधार पर अर्थात् उनमें आत्मसन्तोषकी भावना भरनेपर विश्वास करता हूँ । इस तरहका सुधार मालिकोंको उनके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करनेके लिए बाध्य कर देगा । दक्षिण आफ्रिका और भारत दोनोंमें बराबर अपने अनुभवसे मैंने हमेशा इस सिद्धान्तपर अत्यधिक जोर दिया है कि मजदूरोंको आत्मबलका विकास करना चाहिए। तब पूंजी सचमुच श्रमकी दास बन जायेगी। जिस प्रकार मैं चाहता हूँ कि भारत और इंग्लैंड एक-दूसरे से सहयोग करें, उसी प्रकार में चाहता हूँ कि पूंजी और श्रम भी एक-दूसरेसे सहयोग करें। मुसलमानों द्वारा प्रस्तावित संयुक्त मतदानके सम्बन्ध में महात्मा गांधीने कहा कि संयुक्त मतदानका प्रस्ताव एक शुभ लक्षण है और अच्छा शकुन है। पर जबतक में प्रश्नके सभी पहलुओं पर विचार न कर लूँ, तबतक अपनी राय विस्तारसे देनेका खतरा नहीं उठा सकता। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित अखिल भारतीय सम्मेलनमें इस मामलेका अन्तिम रूपसे फैसला हो जायेगा । क्या निकट भविष्यमें आपका विदेश यात्राका कोई इरादा है ? इस समय तो मेरा कोई इरादा नहीं है । चीन जानेका भी नहीं ? मैं अभी कुछ निश्चित रूपसे नहीं कह सकता पर इतना जानता हूँ कि इस साल में चीन नहीं जा रहा हूँ । क्या खादोके सन्देशका हरिद्वारके तीर्थयात्रियों और साधुओंपर कुछ प्रभाव पड़ा था ? इस सम्बन्धमें कुछ कहना बड़ा कठिन है। सच तो यह है कि पंडित मदनमोहन मालवीय खादी प्रचार कार्यमें इन साधुओं और तीर्थयात्रियोंकी सहानुभूति पानेका Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४२
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