२०६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय परन्तु में इतना व्यस्त रहा हूँ कि मैं ऐसा नहीं कर पाया । १९२५में अपने दौरेके दौरान मुझे भारतमें दुधारू पशुओंके संरक्षणसे सम्बन्धित विषयका अध्ययन करनेके बहुतसे अवसर मिले थे। और मैं इस नतीजेपर पहुँचा हूँ कि दुधारू पशुओंका वध तबतक कारगर रूपसे बन्द नहीं किया जा सकता जबतक उनका वध रोकनेके इच्छुक लोग भी चमड़ेका काम शुरू नहीं करते। यह देखते हुए कि भारतसे प्रतिवर्ष ९ करोड़ रुपयेकी खालें विदेश भेजी जाती हैं, इस उद्योगका काफी महत्त्व है। हिन्दुओंके लिए भी चमड़ेका व्यापार करना पाप नहीं है। और मुझे आशा है कि जब में अगली बार सार्वजनिक जीवदया खाता देखने आऊँगा तब यहाँ चमड़ा साफ करनेका एक कारखाना भी चालू हो चुका होगा । अन्तमें गांधीजीने संस्थाकी समितिको सलाह दी कि वह भैंसें पालनेके बजाय अपने सब साधनोंका उपयोग गोपालनके लिए करे । महात्माजीने कहा कि यदि में बम्बईका गवर्नर होता तो में इस पशुशालाको बीस मील दूर ले जाता और उसके लिए केवल १० एकड़ ही नहीं, वरन् चरागाह बनाने के लायक हजारों एकड़ भूमि देता । संस्थाको आर्थिक लाभके लिए पशुशालासे सम्बद्ध एक चमड़ेका कारखाना भी खोलना चाहिए। उसे खेतीसे सम्बन्धित संस्थाओंसे सम्पर्क बढ़ाना चाहिए ताकि खादका अधिक लाभदायक उपयोग हो सके। [ अंग्रेजीसे ] बॉम्बे क्रॉनिकल, २५-३-१९२७ १९०. भेंट : महाराष्ट्रके दौरेके सम्बन्धमें २४ मार्च, १९२७ मैं अपने कुछ मित्रोंकी इस आशंकासे कि महाराष्ट्र चरखा और कताई सम्बन्धी सन्देशको प्रेमसे नहीं अपनायेगा, कभी सहमत नहीं था । अबतक जो चन्दा इकट्ठा हुआ है मेरे अनुमानसे बहुत ज्यादा है, क्योंकि मेरा अनुमान सिर्फ १ लाखका था । कुल मिलाकर १,२०,००० रुपये प्राप्त हुए। इसमें खादीकी बिक्रीसे प्राप्त रकम शामिल नहीं की गई जो लगभग बिहारके बराबर ही अच्छी हुई। [ अंग्रेजीसे ] बॉम्बे क्रॉनिकल, २५-३-१९२७ १. पद अनुच्छेद २६-३-१९२७ के हिन्दुस्तान टाइम्सले लिया गया है। २. यह भेंट गांधीजीने कोल्हापुरके लिए रवाना होते समय पूना रेलवे स्टेशनपर एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको दी थी। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४४
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