१९१. भाषण : बालकोंकी सभा, कोल्हापुर में ' २५ मार्च, १९२७ स्कूलके सारे ही छोटे-छोटे बच्चे खासी-अच्छी रकमकी थैली लिये हुए धूपमें खड़े गांधीजीका इन्तजार करते रहे। थैलीको रकम उन्होंने ही इकट्ठा की थी । गांधीजीने उन्हें निर्भीकताका पाठ सिखाया : निर्भीकता समस्त शिक्षणका आधार है, अथ है इति नहीं है । यदि शिक्षाका महल तुम उसी [ निर्भीकताकी ] नींवपर बनाकर तैयार नहीं करोगे तो तुम्हारी सारी शिक्षा व्यर्थ ढह जायेगी । उन्हें इस पाठको हृदयंगम करानेके लिए उन्होंने बच्चोंको प्रह्लाद की कथा सुनाई और उसी तरह शालीनतासे, बहादुरीसे परिणामोंकी परवाह किये बिना जैसे कि बारह सालके प्रह्लादने किया था, सत्यको घोषणा करनेकी प्रेरणा दी। [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ३१-३-१९२७ १९२. भाषण : कोल्हापुरके ईसाइयोंके समक्ष कोल्हापुर २५ मार्च, १९२७ 'ईश्वरका राज्य' आनेके बारेमें मेरा अनुभव यही कहता है कि ईश्वरका राज्य तो आज भी है और आप जिस 'बाइबिल'को मानते हो, उसके अनुसार ईश्वरका राज्य हमारे दिलमें है, और यदि ईश्वरके भक्त उसे देखना चाहते हों तो ईश्वरका कार्य करके ही उसे देख सकते हैं। उसका सिर्फ नाम जपकर उसे नहीं देखा जा सकता। इसलिए आप यदि यह बाट जोहते हुए बैठे हों कि ईश्वरका राज्य किसी दिन आनेवाला है, तो यह आपकी भारी भूल है । आपको तो यह समझ लेना चाहिए कि ईश्वरका राज्य हमारे दिलमें ही है। आप कहते हैं कि आपको मेरा काम अच्छा लगता है । यह सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई है । किन्तु मैं यह कहना चाहता कि मैं जो कार्य कर रहा हूँ उसका उद्देश्य इसी राज्यको लाना है। इसे सिद्ध करनेके लिए ही में अस्पृश्यता दूर करनेका प्रयत्न कर रहा हूँ। मैं यह भी कह देना चाहता हूँ कि यदि आपको यह काम पसन्द हो तो आपको खादी भी अपनानी चाहिए, क्योंकि मेरे मतानुसार अस्पृश्यता निवारणके द्वारा हम जो कुछ करना चाहते हैं, खादी कार्य उससे भी आगे जाता है। क्या आपको मालूम है कि १. महादेव देसाईंकी “ साप्ताहिक चिठ्ठी " से । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४५
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