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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४६

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२०८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय भारतमें लाखों ऐसे गाँव हैं जहाँके लोग भूखों मर रहे हैं और सर्वनाशके किनारे पर खड़े हैं। यदि हम ईश्वरकी आवाज सुनना चाहते हैं, तो वह यही कहती है कि आप भूखसे मर रही इस जनताका विचार करें, मेरा नाम लेना झूठ है। इसलिए यदि हम गरीबों को मदद देना चाहते हैं और उनका काम करना चाहते हैं तो हमें क्या करना चाहिए ? यहीं चरखा सामने आता है। कोई आठ दिन हुए सम हिगिनबॉटम नामके ईसाई मिशनरी मित्र मुझे मिलने आये थे । वे जानना चाहते थे कि गरीबों के लिए क्या धन्धा हो सकता है, संयोगवश वे जिस जगह मुझसे मिलने आये वह उस क्षेत्रमें है, जहाँ गरीबोंने चरखेकी मदद ली है। उन्होंने स्वयं अपनी आँखोंसे देखा कि चरखेमें कितनी शक्ति है। यदि आप भी स्वयं देखना चाहते हैं तो वहाँ जाकर देखिए। और आपको जाकर देखनेका अवकाश न हो तो मेरे जैसे जो व्यक्ति उनके बीच रहते हैं उनकी बातपर विश्वास कीजिए। यदि आपको विश्वास हो तो स्वयं सूत कातिए और गरीबों द्वारा बनाई हुई खादीका उपयोग कीजिए । यहाँ प्रदर्शनी हो रही है। यदि आपको मेरी बात ठीक लगती हो तो प्रदर्शनी में जाकर खादी देखिए और उसकी सारी खादी खरीद डालिए । [ गुजरातीसे ] नवजीवन, ३-४-१९२७ १९३. भाषण : कोल्हापुरको सार्वजनिक सभामें २५ मार्च, १९२७ खादीका उद्देश्य बहुत महान है। लेकिन ऐसा नहीं है कि खादी पहननेसे कोई बुरा मनुष्य अपने आप अच्छा बन जाता है । पर मैं तो व्यभिचारी और वेश्यासे भी कहूँगा कि आप खादी पहनें। मैं उनसे कहूँगा कि आपके चरित्रके बारेमें तो मैं आपसे क्यों कहूँ ? उसका जवाब तो ईश्वर लेगा ही । लेकिन गरीबोंके लिए आपके हृदयमें सहानुभूति हो तो आप खादी जरूर पहनें। हम गेहूँ खाते हैं; वे भी उसी तरह गेहूँ खाते हैं न? उसी तरह वे खादी भी पहनें, ब्राह्मण पहनें, ब्राह्मणेतर पहनें, पारसी पहनें, ईसाई पहनें, मुसलमान पहनें, जिन्हें देशसे प्रेम हो वे सब खादी पहनें। खादी में स्वार्थके साथ परमार्थ भी सकता है । शराब और व्यभिचारमें रुपया लुटानेवाला पापी है। बीड़ी पीनेवाला अपेक्षाकृत कम पाप करता है। विदेशी कपड़ा पहननेवाला भी कदाचित बीड़ी पीनेवाले के बराबर ही पाप करता है। मिलका कपड़ा पहननेवाला पाप नहीं करता तो पुण्य भी नहीं करता, क्योंकि धनवानका घर भरना हमारा कर्त्तव्य नहीं है । पर खादी लेनेवालेकी बात दूसरी हो जाती है। खादीकी पूरी-पूरी कीमत गरीबके घर जाती है, गरीबोंके साथ उसका सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इस प्रकार, खादी पहननेवालेकी वृत्ति सुधरती है, इसमें कोई शंका नहीं है । [ गुजरातीसे ] नवजीवन, ३-४-१९२७ Gandhi Heritage Portal