२१४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय जा सके और घुमा-फिराकर उनका व्यायाम भी कराया जा सके। अगर सभी गोशाला- ओंका प्रबन्ध मेरे हाथोंमें होता तो मैं अधिकांश गोशालाओंको मुनाफेमें बेच देता और आसपास में ही सुभीते की जमीन खरीदता । जिन गोशालाओंकी आवश्यकता केवल दूधके डिपोके लिए होती, सिर्फ उन्हें ही नहीं बेचता । २. प्रत्येक गोशालाको आदर्श दुग्धालय और चर्मालय बनाना चाहिए। हरएक मरे हुए ढोरके चमड़ेको वैज्ञानिक ढंगसे कमाया जाना चाहिए और उसकी खाल, हड्डियों और दूसरे अंगोंका अधिक से अधिक लाभदायक उपयोग होना चाहिए। मैं मृत ढोरके चमड़ेको वध किये गये ढोरके चमड़े और उसके अन्य अंगोंसे जिन्हें मानवके या कमसे-कम हिन्दुओं के व्यवहारके लिए अनुपयुक्त मानना चाहिये, पवित्र और व्यवहार्य वस्तु मानूंगा । ३. कई गोशालाओं में गोमूत्र और गोबरको फेंक दिया जाता है। इस बरवादीको मैं गुनाह मानता हूँ । ४. सभी गोशालाओंका प्रबन्ध वैज्ञानिक ढंगसे होना चाहिए। ५. अगर सुचारुरूपसे प्रबन्ध किया जाये तो हरएक गोशाला स्वावलम्बी होनी चाहिए, और वह स्वावलम्बी बनाई जा सकती है और दानकी रकमोंका उपयोग गोशाला के विकास में हो सकता है। इन संस्थाओंको मुनाफा कमानेवाली संस्थाएँ बनाने का विचार नहीं है; बल्कि सभी मुनाफोंका उपयोग अंगहीन, लाचार और खुले बाजारमें कसाईखाने के लिए बिकनेवाले सभी जानवरोंको खरीदने के काममें किया जाना चाहिए। ६. अगर गोशालाएँ भैंस, बकरियाँ भी रखेंगी तो फिर ये सारे काम हो पाना असम्भव होगा । जहाँतक में देख सकता हूँ, मैं इससे कितना ही उलटा क्यों न चाहूँ, मगर जबतक सारा हिन्दुस्तान निरामिष भोजी नहीं बन जाता, तबतक क्या बकरियाँ या भेड़ें कसाईकी छुरीसे बचायी जा सकती है ? अगर हम भैसका दूध पीनेका आग्रह छोड़ दें और धर्म समझकर गायके दूधकी तुलनामें भैंसके दूधको तरजीह न दें तो गाय को बचाया जा सकता है। दूसरी ओर बम्बई में गायके दूधके बदले, भैंसका ही दूध पीनेका चलन है। सभी चिकित्सक एकमतसे कहते हैं कि स्वास्थ्यको दृष्टिसे गायका दूव भैंसके दूधसे कहीं अच्छा होता है और दुग्धालय-विशेषज्ञोंकी राय है कि विवेकपूर्ण प्रबन्ध द्वारा गायका दूध, जैसा आजकल मिलता है, उससे कहीं अधिक पुष्टिकर बनाया जा सकता है। मैं मानता हूँ कि गाय और भैंस दोनोंको बचा सकना असम्भव है। गायकी रक्षा केवल तभी की जा सकती है जब भैंसकी नस्ल बढ़ाना बन्द कर दिया जाये। खेती के काम में भैंसेका उपयोग बड़े पैमाने पर नहीं हो सकता। अगर उनकी नस्ल हम और न बढ़ायें, तो आज जितनी भैंसे हैं, उन्हें हम बचा सकते हैं, तो भैंसकी या इस दृष्टिसे गायकी भी नस्ल बढ़ाना धर्मका कोई अंग नहीं है। हम अपने कामके लिए उनकी नस्ल खड़ी करते हैं। भैंसकी नस्ल तैयार करना तो गाय और भैंस दोनोंके प्रति क्रूरता है। जीवदयावादियोंको मालूम होना चाहिए कि इस समय भी हिन्दू ग्वाले पाड़ेको बड़ी निर्दयतासे मार डालते हैं, क्योंकि उसे खिलाने में कोई Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२५२
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