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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२५३

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पत्र : सतीशचन्द्र मुखर्जीको - २१५ लाभ नहीं होता है। गाय और उसकी सन्ततिकी रक्षाके लिए • हिन्दू गाय और उससे सम्बद्ध तिजारतमें से मुनाफा छोड़ सकते हैं, किसी अन्य दशामें नहीं और यही एकमात्र व्यावहारिक प्रस्ताव है। सच्चे धर्मको जीवदयाका खाता ठीक रखना ही होगा यानी आमदनी और खर्च पूरी तरह बराबर होने चाहिए। ऐसी स्थिति गाय और केवल गायके मामलेमें ही कुछ वर्षतक धार्मिक हिन्दुओंके दानकी सहायता मिलनेपर सम्भव हो सकती है। यह याद रखना चाहिए कि यह बहुत बड़ा मानवीय प्रयोग गोभक्षक संसारके विरोधके रहते हुए हो रहा है। जबतक सारा संसार मुख्यतः निरामिष भोजी नहीं बन जाता, मैंने जो सीमाएँ बतलाई हैं उनसे आगे बढ़ सकना क्या सम्भव है ? यहाँतक सफलता पानेका अर्थ है, आगेकी पीढ़ियोंके लिए और प्रयत्न करनेका रास्ता खोल देना । इन सीमाओंका उल्लंघन करनेका अर्थ होगा, हमेशा के लिए गायको और उसके साथ-साथ भैंस तथा और दूसरे जानवरोंको भी कसाईके हाथों में दे देना । गोशालाओं और पिंजरापोलोंके प्रबन्धक हिन्दू लोग और दूसरी दयाप्रचारिणी सभाएँ, अगर वे वास्तवमें धार्मिक हैं, तो गोरक्षाकी ऊपर दी हुई शर्तोंको ध्यानमें रखेंगी और उन्हें तुरन्त ही अमलमें लाना शुरू करेंगी । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ३१-३-१९२७ प्रिय सतीश बाबू, २०१. पत्र : सतीशचन्द्र मुखर्जीको २८ मार्च, १९२७ मैं जानता हूँ कि आप मेरे बारेमें सोचते रहते हैं । मत सोचिए " ऐसा कहना निष्ठुरता होगी। परन्तु " प्रार्थना कीजिए" यह कहना न्यायसंगत होगा। बीमार हूँ या ठीक हूँ, जी रहा हूँ या मर रहा हूँ, इन चीजोंका आपके लिए या मेरे लिये कोई महत्त्व नहीं होना चाहिए। चिन्ता करनेसे मेरे लिए जितना समय नियत है उसमें एक क्षण भी और नहीं बढ़ जायेगा । इस सम्बन्धमें अभी कुछ भी निश्चित नहीं है कि आगे मुझे क्या करना है । यथासम्भव में डाक्टरोंके निर्देशपर चल रहा हूँ । " कलकी कुछ चिन्ता मत करो" यह यीशुका सुन्दर संग्रहीत वचन है । “सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ "" यह श्लोक इस समय मेरे मनको बहुत भला लग रहा है। दोनों कहावतों में अन्तर्निहित अभिप्राय एक ही है । हृदयसे आपका, अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९१७१) की नकल से । सौजन्य : के० पी० एस० मालानी १. भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ३८ । बापू Gandhi Heritage Portal