२१५. पत्र : अमृतलाल वि० ठक्करको ढेढ़ भीलादिके पुरोहित, अम्बोली शुक्रवार, १ अप्रैल, १९२७ मेरे स्वास्थ्य की खरावीने मुझे बिछौनेपर डाल रखा है, इसलिए मैं कल आपका भाषण आदिसे अन्ततक पढ़ गया । उससे मुझ जैसेको थोड़ी-सी जानकारी प्राप्त हुई। लेकिन मेरी नम्र रायमें अध्यक्ष के भाषणके रूपमें वह नहीं चल सकता। आपने मुझे 'वीटो 'का जो अधिकार दिया है उसके आधारपर में ऐसा नहीं लिख रहा हूँ, में तो यह मित्रकी हैसियतसे ही कह रहा हूँ । भाषण में प्रमाणका अभाव दिखता है। हम हालमें ही अपने प्रमाणका निर्वाह करनेकी शक्ति खो बैठे हैं। दूसरा कारण है कि राणा साहबके साथ हमारा अलिखित करार इससे भंग होता है। तीसरा कारण यह है कि जो प्रेक्षक वहाँ एकत्र होंगे यह भाषण उनके लायक नहीं है। इसमें प्रमाणका निर्वाह नहीं हुआ है, क्योंकि यह भाषण पिछली परिषदसे सम्बद्ध नहीं है । राणा साहबके साथ हमारा अलिखित करार है कि व्यक्तिगत चर्चा आदि नहीं होनी चाहिए। इससे यह करार टूटता है और इस समय हम जिस समाजको जगानेका प्रयत्न कर रहे हैं वह इस भाषणको न तो समझ सकेगा और न पढ़ेगा । 'गुलिवर ' पढ़कर किसी काल्पनिक देशका चित्रण किया होता और उसमें अपने व्यंग्य वचन गूंथे होते तो जो आपने कहा है उसका अधिकांश कह सकते थे । अथवा यदि आपने ईसपका अनुवाद किया होता तो सौराष्ट्र के हर पेड़पर अपने काल्पनिक पंछी बैठाकर उनके संवादोंके द्वारा अपने सिद्धान्त समझा सकते थे और हम सबको हँसाते हुए शिक्षा भी दे सकते थे। अथवा व्यासजीकी तरह अमानवीय और अति मानवीय पात्र तैयार करके वास्तविक इतिहासको भुलाकर मानवजातिके प्रतीकात्मक इतिहासकी रचना कर देते और हमें सौराष्ट्रका एक अल्पकाय 'महाभारत' बना कर दे देते ? आपने जो भाषण तैयार किया है या जो आपके लिये तैयार किया गया है उसके लिए तो नये प्रेक्षक तैयार करने होंगे। इसलिए पहला काम तो यह होगा कि भावनगर में बनाये गये संविधानको रद कर दिया जाये। ऐसा करनेके लिए में सहमत हो जाऊँ तभी यह हो सकता है। फिर कुछ चुने हुए लोगोंकी परिषदका आयोजन करना होगा, जो इस भाषणके विचारोंको समझ सकें या उसपर अमल कर सकें । उसके बाद ऐसी परिषदके सामने ये विचार पेश करने और उनपर अमल करानेकी जरूरत होगी । १. प्रसिद्ध अंग्रेजी पुस्तक, गुलिवर्स ट्रैवल्स । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२६२
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