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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७३

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पत्र : वा० गो० देसाईको २३५ पर मैं देखता हूँ कि जो लोग इससे भिन्न कुछ करना चाहते हैं उनके लिए अलग संस्था होनी चाहिए। राजकीय परिषद इस प्रयोजनके काम आ सकती है । पर ये तो एक बीमार आदमीके विचार हैं । आप देवचन्दभाई आदिसे मिलें और शान्तिसे कोई हल ढूंढ़े । मेरे पास आना हो तो सभी अपने-अपने खर्चसे आयें, वह भी पन्द्रह दिनके बाद। मुझे लगता है कि अभी मुझमें लम्बी बातचीत करनेकी शक्ति नहीं है । प्रभुकी इच्छा हुई तो जून मासकी तारीख निभानेकी आशा रखता हूँ । पर अभी निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता । करना । जो कुछ करना हो, स्वयं-नियुक्त न्यासियोंकी तरह तटस्थ भाव से घबराये बिना बापूके आशीर्वाद [ पुनश्च : ] सम्भवतः मुझे १९ तारीखको बेलगाँवसे नन्दी हिल्स ले जायेंगे । नन्दी हिल्स बंगलोरके पास है । वहाँ हम २० तारीखको पहुँचेंगे । गुजराती (सी० डब्ल्यू ० २८५६ ) से । सौजन्य : शारदाबहन शाह भाईश्री ५ वालजी, २२७. पत्र : वा० गो० देसाईको अम्बोली चैत्र सुदी ५ [ ६ अप्रैल, १९२७] [६ आदरणीय रेवाशंकरभाईका पत्र पढ़ा, उनका कहना ठीक तो है। सभा तथा संस्थाके नियमोंको तो तुम्हें जान ही लेना चाहिए। जो प्रस्ताव पास हों उनकी नकल कोषाध्यक्षको तुरन्त ही भेज देनी चाहिए। उसपर तुम्हारे हस्ताक्षर. .' हैं ? अन्य सदस्योंको भी. प्रस्ताव ही अब रेवाशंकरभाईको .* वर्षामें पास किये गये प्रस्ताव और उसके बाद साधारण बैठकमें पास किये गये प्रस्तावोंकी नकलें भी अपने हस्ताक्षर सहित भिजवा दें । उचित तो यही जान पड़ता है कि ये नकलें समितिके सदस्योंको भी भेजी जायें । जिन नये सदस्योंका चुनाव हुआ है उन्हें उनके चुनावके सम्बन्धमें लिख दें तथा उनसे अपनी स्वीकृति देनेका अनुरोध करें । १, २, ३ व ४. मूलमें अस्पष्ट है। Gandhi Heritage Portal