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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७७

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प्रिय सतीश बाबू, २३०. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको ७ अप्रैल, १९२७ आपका प्यारा पत्र मिला । आप देखेंगे कि फिलहाल दौरा रद कर दिया गया है । मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि मैं कोई काम उतावली में नहीं करूँगा और अपने शरीरको आराम देनेका अपनी हदतक पूरा प्रयत्न करूँगा । कृपया मेरे बारेमें चिन्ता न कीजिएगा। क्या आप, हेमप्रभादेवी, बच्चा और तारिणी बाबू सकुशल हैं। आपका, बापू [ पुनश्च : ] १८ तारीखतक अम्बोली और उसके बाद मैसूर । श्रीयुत सतीशचन्द्र दासगुप्त होम विल्ला गिरीडीह अंग्रेजी (जी० एन० १५६६) की फोटो- नकलसे । २३१. पत्र : नानालाल कविको ७ अप्रैल, १९२७ कवि कहता है कि दमयन्तीके निर्दोष होते हुए भी उसपर चोरी करनेका दोष लगा। इसमें उसका नसीब ही टेढ़ा था; वैसाही मेरे साथ भी हुआ है। शुद्ध भावसे, और उसके लिए यत्किंचित परिश्रम करके मैंने प्रेमपूर्वक, मुझसे जैसा बना वैसा एक स्तुतिपत्र लिखकर भेजा था । वह आपको नहीं रुचा । मुझसे अनजानमें जो दोष हो जाते हैं उनके लिए में प्रतिदिन प्रातःकाल प्रभुसे क्षमा-याचना करता हूँ । अनजाने ही इस दोषके लिए मैं आपसे भी क्षमा माँगता हूँ; क्या आप क्षमा नहीं करेंगे ? जबतक आप क्षमा नहीं करेंगे तबतक में याचना तो करता ही रहूँगा । [ गुजरातीसे ] महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी से । सौजन्य : नारायण देसाई मोहनदास के वन्देमातरम् Gandhi Heritage Portal