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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७८

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२३२. पत्र : गोकलभाईको ७ अप्रैल, १९२७ आपका पत्र मिला । आपने सन्देश' पढ़कर नहीं सुनाया, यह ठीक ही किया । जिसकी स्तुति की जाती है उसे भेजा हुआ सन्देश यदि उसे न रुचे तो वह पढ़ा ही नहीं जाना चाहिए। यदि आपने उसे अन्य पत्रोंमें भी प्रकाशित न कराया होता तो अच्छा होता। मेरे सन्देशके बिना कौन-सी कमी रह जाती ? मेरे विचारसे तो कविका क्रोध भी उन्हें दुधारू गाय ही सिद्ध करता है। वे कितना ही क्रोध क्यों न करें मैं उसे सहन कर लूँगा किन्तु दूर बैठे हुए भी में उनकी शक्तिका उपयोग तो जरूर करूँगा । आप निश्चिन्त रहें। साथका पत्र आप उन्हें पहुँचा दें। [ गुजरातीसे ] महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरीसे । सौजन्य : नारायण देसाई २३३. पत्र : नानाभाईको ८ अप्रैल, १९२७ प्राणायाम और आसनादिपर मेरी सदा श्रद्धा रही है, किन्तु कोई गुरु न मिलनेके कारण मैं उनके प्रयोग नहीं कर सका। सौभाग्यसे में इन दिनों खटियापर पड़ा हुआ हूँ, इसलिए कुछ पढ़ने और सोचने-विचारनेको मिल जाता है । सातवलेकरके आसन सम्बन्धी लेख पढ़नेसे उस ओर विशेष रूपसे ध्यान गया है। आप तो नाथूराम शर्माके शिष्य हैं इसलिए आपको इसका अनुभव होना चाहिए। मेरा भी उनसे सम्पर्क रहा, किन्तु वे मुझे प्रभावित नहीं कर सके। हमारे कुटुम्बके चार-पाँच लोगोंपर उनका प्रभाव था । किन्तु अपने अनिश्चयके कारण मैं उनसे आसनादि न सीख सका । अब आसनादिके सम्बन्धमें आपके अनुभव जानना चाहता हूँ। क्या आपने उनका अभ्यास किया है ? यदि किया है तो क्या वह अभ्यास अबतक चल रहा है ? आप इस सम्बन्धमें जो कुछ भी जानते हों और उसे मुझे भी बता सकें तो बतायें। [ गुजरातीसे ] महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरीसे । सौजन्य : नारायण देसाई १. नानालाल कविके जन्म-दिवसपर । २. देखिए पिछला शीर्षक । Gandhi Heritage Portal