२३४. पत्र : अमृतलाल को
८ अप्रैल, १९२७
अमृतलाल बापा के नाम लिखा मेरा पत्र तो तुमने देखा ही होगा। मेरी इच्छा है कि तुम उसे देखो। आखिर उनका भाषण तुम्हारी ही कृति तो है। मैं चाहता हूँ कि इस बात का निर्णय शुद्ध तात्त्विक दृष्टि से किया जाये। इसमें मेरी भावनाओं को आड़े नहीं आने देना चाहिए। और यदि मेरी भावनाओं का ही प्रश्न हो तो मेरी भावना यही होगी कि जो काठियावाड़ के वातावरण के अनुकूल हो और वहाँ के लोगों के लिए श्रेयस्कर हो वही होना चाहिए। मैं जो खादी का पक्षपाती हूँ उसका कारण यह है कि मैं उसे श्रेयस्कर मानता हूँ, किन्तु यदि वह वहाँ के वातावरण के अनुकूल न हो तो वह श्रेयस्कर क्योंकर होगी? ऑक्सीजन हमारे लिये प्राणवायु है, किन्तु वृक्षों के लिए? काठियावाड़ का वातावरण तो आप सब लोग ही हैं। यदि कोई बात तुम सबको मैं न समझा सकूँ तो मुझे किसी दूसरे उपाय का सहारा लेना चाहिए अथवा उसे छोड़ देना चाहिए।
तुम्हारी योग्यता से मैं परिचित हूँ। तुम्हारे कुछ काम तो मुझे बहुत ही पसन्द आते हैं। मैं तुम्हारी गिनती देशसेवकों में करता हूँ। तुममें हिम्मत है। उसका उपयोग करते हुए दूसरों को भी हिम्मत बँधाओ और यदि मेरा विरोध करने का मौका आये तो ज़रा भी न डरते हुए विरोध करो। मैं जो चाहता हूँ सो नहीं, बल्कि तुम जो चाहते हो वही करना, क्योंकि यही उचित है। माँगे हुए कपड़ों में हम कहीं फब सकते हैं!
आजकल मेरा मन खादी आदि रचनात्मक कामों के सिवाय अन्य कामों में नहीं लगता। रचनात्मक काम करते हुए यदि मेरी ज़िन्दगी बाकी होगी तो सत्याग्रह की मर्यादा के भीतर रहकर मुझे किसी दिन लड़ाई ठान देने की बात भी सूझ सकती है और यदि मेरी ज़िन्दगी में यह लड़ाई न हो सकी तो मेरे बाद जिन्हें उसकी जानकारी होगी, वे लड़ेंगे।
हिंसात्मक क्रान्ति की बात तो मुझे रुचती ही नहीं। जब ज़हरीले साँप को ही मारने की मुझे इच्छा नहीं होती तो फिर ज़हरीले मनुष्य की तो बात ही क्या? मैं जानता हूँ कि दुनिया ने स्वतन्त्रता प्राप्त करने का एक मार्ग हिंसात्मक क्रान्ति को भी माना है। किन्तु हिंसात्मक क्रान्ति निरर्थक है, यह बताने में मैं अपना जीवन लगा देना चाहता हूँ। इसी में मुझे आनन्द आता है, इसलिए मेरा धीरज कभी चुकता नहीं। मुझे जितने रास्ते सूझते हैं वे सब शान्ति के ही रास्ते हैं। मेरे लिए तो वही सबसे
१. देखिए "पत्र : अमृतलाल वि० ठक्कर को", १-४-१९२७।
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