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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८२

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२४४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय २. फिलहाल मुझे जितना समय मिलता है अथवा मुझमें जितनी सामर्थ्य है उसको देखते हुए मुझे ऐसा नहीं लगता कि में काठियावाड़में चल रहे खादीके कामके लिए अलग से चन्दा उगाह सकूंगा । इसलिए मैं तो ऐसा सोचता हूँ कि हम यह कार्य चरखा संघको सौंप दें और उसके नियमोंके अनुसार जितना काम हो सके उतना ही करें। इस सम्बन्ध में मैंने भाई फूलचन्दको लिखा' है। तुम भी इस बारेमें विचार करना । शायद अधिक अच्छा तो यह होगा कि इसे गुजरातके कामके साथ मिला दिया जाये। फिलहाल में इतनी बात स्पष्ट देख रहा हूँ कि उसे स्वतन्त्र रूपसे नहीं चलाया जा सकता। इस सम्बन्धमें आवश्यक समझो तो लक्ष्मीदास वहाँ हो तो उससे और शंकरलालसे विचार-विमर्श करना। इस बीच आश्रममें जितनी सुविधा मिल सके उसके अनुसार काठियावाड़के कामको देखते और बढ़ाते रहो तथा उसकी सूचना मुझे देते रहो। इतना ध्यान रखना कि जो काम हो चुका है अथवा जो करना है वह अस्त-व्यस्त न हो । ३. आजकल तुम 'यंग इंडिया' में [ खादीके कार्यसे सम्बन्धित ] आँकड़े और विवरण प्रकाशित नहीं करते । उत्पादनके आँकड़े तो प्रकाशित होने ही चाहिए तथा सदस्योंसे जो सूत प्राप्त होता है, उस सम्बन्धमें भी आवश्यक जानकारी भेजते रहा करो । मैं अब धीरे-धीरे काम करने लायक हो गया हूँ इसलिए अब मुझे बख्शना मत। जो कुछ लिखने योग्य हो सो सब लिखना और जो कुछ पूछना चाहो वह पूछना | चि० पुरुषोत्तमसे मैंने बातचीत की थी और अब उसके साथ मेरा पत्र-व्यवहार भी चल रहा है । में इस बारेमें तुम्हें बता नहीं सका था। मुझे ऐसा लगा कि वह निर्मल हृदयका युवक है। आशा है भगवान उसका मंगल ही करेंगे । कनुका क्या हाल चाल है ? गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ९१४१) से । सौजन्य : जमनादास गांधी १. देखिए " पत्र : फूलचन्द शाहको ", ६-४-१९२७ । बापूके आशीर्वाद Gandhi Heritage Portal