२५० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय अधिकारी सचमुच नहीं जानते कि जब वे तुमसे मिलते हैं तब उनकी हैसियत क्या होती है। वे तुम्हारे जीवनकी विगत बातोंको भूल नहीं सकते और स्वाभाविक है कि घबरा जाते हैं । तुम्हें उन्हें निश्चिन्त कर देना पड़ेगा। कहते हैं कि जब ब्रिटेनके मौजूदा राजा नाविक रूपमें भरती हुए थे तो उनके साथ नाविकों जैसा बर्ताव ही किया जाता था और दूसरे नाविकोंकी तरह उन्हें भी नाश्तेमें कॉफी और काली रोटी दी जाती थी। यह तो उससे सम्बन्धित सबसे छोटी बात थी। उन्हें साधारण नाविक ही समझा जाता था । इसी तरह एक दिन तुम भी मामूली देहाती लड़की ही समझी जाओगी। वह तुम्हारे और मेरे दोनोंके लिए गर्व की बात होगी । सस्नेह, अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५२१६) से । सौजन्य : मीराबहन २४५. पत्र : सुरेन्द्रको बापू बुधवार [ १३ अप्रैल, १९२७] चि० सुरेन्द्र, तुम्हारा पत्र मिला । यदि वहाँसे छुट्टी मिल सके तो तुम नाथजीके पास तथा वर्धा अवश्य जाना। इसमें सन्देह नहीं कि आरोग्यशास्त्रका अध्ययन करना अत्यन्त आवश्यक है, जिसमें आसन और प्राणायाम भी शामिल है। में यह मानता हूँ कि कोई सिखानेवाला होना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि तुम इसका अभ्यास करो। नाथजीको तो आसनादिका कुछ अनुभव है, किन्तु ऐसा नहीं जान पड़ता कि उसपर उनकी कुछ बहुत श्रद्धा है। इस बारेमें मेरे कुछ लोगों से बातचीत करनेपर यह परिणाम निकला कि बीमारीसे छुटकारा पाने में आसनादिसे कोई बहुत मदद नहीं मिलती । किन्तु में स्वयं इस मतका समर्थक नहीं हूँ । यदि तुम्हारी इच्छा सीखनेकी हो तो मैं तुम्हें पं० सातवलेकरके पास भेज दूंगा । हरिद्वारमें एक स्वामीजी हैं। उनका कहना है कि यदि कोई आश्रमवासी उनके पास आसनादि सीखनेके लिए आयेगा तो वे उसे सिखा देंगे। मैं उनसे कभी नहीं मिला, किन्तु महादेव मिला है। जिस शुद्धताकी में आशा करता हूँ वह मुझे कहीं नहीं मिली, किन्तु हमें तो आसनादि सीखने -भरका सम्बन्ध चाहिए। नाथजीकी राय जानकर उन्हें पत्र लिखना । गुजराती (एस० एन० ९४१४) की फोटो नकलसे । बापूके आशीर्वाद १. सुरेन्द्रको ५० सातवळेकरजीके पास भेजनेके उल्लेखसे; देखिए “पत्र : श्री० दा० सातवळेकरको ", १४-४-१९२७, जिसमें गांधीजीने लिखा था " एक अच्छा विद्यार्थीको आपके पास भेजनेका प्रयत्न कर लुंगा।" Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८८
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