२४९. पत्र : श्री० दा० सातवलेकरको अम्बोली १४ अप्रैल, १९२७ भाई सातवलेकर, आपका प्रत्युत्तर शीघ्रतासे आनेके लिये आभार मानता हूँ। एक अच्छा विद्यार्थीको आपके पास भेजनेका प्रयत्न कर लुंगा । आप जो कुछ कृपा कर रहे हैं इस परसे में समझता हूं कि आप मुझको सहाध्यायीका पद दे रहे हैं। मैं ऐसा ही बननेकी कोशिश करूंगा । आपका 'ईशोपनिषद्' ग्रंथ पढ लिया। चित्त बहुत प्रसन्न हुआ । । "ब्रह्मचर्य और सूर्यभेदन व्यायाम" के बारेमें में भाई बापुलालसे' पत्र व्यवहार कर लुंगा । उनको कुछ आर्थिक हानि नहीं पहोचना चाहिये । कुवलयानन्द जी से मेरा परिचय है। मैंने उनके पास एक युवकको भेजा था परंतु वह दुर्बल होने के कारण उनको प्राणायामादिके प्रयोग नहि बताया । परंतु दवाईयोंसे काम लिया । ब्रह्मचर्य पालन इ०के बारेमें आजकलका वायुसे मुझे निराशा नहि है। यदि हममें से कोई भी सच्चा तपस्वी निकलेगा तो उस वायुको हरलेगा। अब तक में ऐसा कोई तपस्वीको नहि मिला हूं। मेरी निजकी तपश्चर्या बहोत अपूर्ण है । मेरा स्थूलकायिक ब्रह्मचर्यं करीब ३० वर्षोंसे चल रहा है। परंतु में विकारशून्य नहि हुं । होने का प्रयत्न कर रहा हूं । मेरा मन्तव्य है कि संपूर्ण ब्रह्मचर्य के पालनके लिये पाँचों इन्द्रियों का संपूर्ण निग्रह होना चाहिये। क्रोधादिको वशमें रखना काफी नहि है, परंतु क्रोधादिकी जड़का नाश होना चाहिये । रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते' में अक्षरश: ऐसा मानता हूँ। अगर मूर्तिपूजक है । जब कोई ऐसी व्यक्ति तैयार होगी तब जो जहरी वायु फैल रही है वह शीघ्र शान्त हो जायेगा। ऐसी व्यक्ति तैयार होने के लिये हम सम्पूर्ण आशाके साथ प्रयत्न करें। आप ही ने तो लिखा है न कि यदि उपनिषदादिका शिक्षण सत्य और सनातन है और है हि तो आज भी हम हैमवती उमाका और यक्षका भी दर्शन कर सकता है -- ईश्वर कृपा होगी तो करेंगे । वीर्यसेवन और वीर्यभक्षणके बारेमें मैंने भी पढ़ा है । मैं इसको आसुरी शिक्षा मानता हूँ । उसमें सत्यांश होने का संभव है परंतु प्रयोग त्याज्य है । क्योंकि हम ब्रह्मचारीको इन्द्रजीत बनाना चाहते हैं । वीर्य रक्षा और वीर्य संग्रह साध्य नहि है परंतु साधन है। वीर्य भक्षणसे विकार रहितता नहि आती है उससे तो वीर्य स्खलनसे होनेवाली दुर्बलताका निवारण यत्किचित हो सकता है । यही वस्तु पाश्चात्य क्रियासे बनती है । वीर्य स्खलनकी उत्पत्ति विकारोत्पत्तिमें है। हमारा उद्देश्य विकारोंका नाश है। १. आनन्द, जिला खेड़ाके आर्यसमाजके कूबड़दास पटेल । सातवळेकरकी पुस्तकोंकि प्रकाशक । २. भगवद्गीता, अध्याय २, ५९ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२९४
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