सावन्तवाड़ीके प्रमुखसे बातचीत २५९ गांधीजी : महादेव जो भी अच्छी बातें आपके बारेमें सुनते रहे हैं, मुझे बताते रहे हैं। इनमें से एकका में आपसे सत्य निरूपण करवाना चाहता हूँ । क्या यह सच है कि आप सरकारी राजस्वसे केवल २,००० रु० अपने निजी खर्चके लिए लेते हैं ? सावन्तवाड़ी महाराज : २,००० रु० नहीं; २,५०० रु० लेता हूँ, किन्तु सभी राजकीय अवसरोंपर किया गया खर्च भी रियासत के राजस्वसे दिया जाता है। यह सब तो ठीक है । अब आप गर्मी के महीनोंमें अम्बोलीमें रहेंगे। क्या यह सारा खर्च रियासत द्वारा भुगतान किया जायेगा ? नहीं, यह सारा खर्च में स्वयं उठाऊँगा । और मैंने सुना है कि आप अपने पास कई अनाथ बच्चे रखते हैं। क्या आप उनका खर्च भी अपनी जेबसे करते हैं ? जी हाँ ! परन्तु वे सब अनाथ नहीं हैं । उनमें से कुछ एक अनाथ भी हैं । किन्तु वे गरीब बालक सम्मानित परिवारोंके हैं । और भी बहुतसे प्रार्थनापत्र हैं । परन्तु मुझे खेद है कि में अधिक लोगोंको अपने पास नहीं रख सकता । अच्छा, केवल आपका दृष्टान्त ऐसा है कि एक राजा सरकारी राजस्वसे निश्चत् भत्ता लेता है । नहीं, आपको और भी बहुतसे मिल सकते हैं। मैसूरके महाराजा भी भत्तेमें एक नियत रकम लेते हैं । तो यह सौभाग्यका विषय है कि मैं आपके आश्रममें रहनेके बाद अब उनका आतिथ्य स्वीकार करने जा रहा हूँ, जो आप जैसे ही हैं । हाँ, ग्वालियरके महाराजा भी रियासतके खजानसे कुछ नहीं लेते थे । इसका क्या अभिप्राय है ? उनकी अपनी निजी आमदनी थी और वे उसीपर निर्वाह करते थे । रियासत की कमाईके अलावा और निजी आमदनी क्या है ? और अब रानीकी ओर अभिमुख होकर जो एक तरहसे बड़ौदा परिवारकी राजकुमारी हैं, गांधीजीने कहा : हाँ मैं जानता हूँ कि त्रावणकोरकी प्रति-संरक्षिका महारानी भी इतनी ही सीधी- सादी हैं जैसी आप। उनकी सादगीसे' में बहुत प्रभावित हुआ था । उनका पहनावा और अधिक सादा नहीं हो सकता था । उनके शरीरपर मुझे मंगलसूत्र के अलावा और कोई गहना नहीं दिखा। उनके कमरेका फर्नीचर जितना सादा हो सकता है उतना सादा था । मेरा युवा महाराजासे परिचय कराया गया । उन्हें उस रूप में महाराजाकी तरह पहचानना कठिन था । परन्तु यहीं यह तुलना समाप्त हो जाती है । वे आपकी तरह स्वल्प वेतनपर निर्वाह नहीं करते । १. देखिए खण्ड २६, पृष्ठ ४२५-२६ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२९७
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