पत्र : गंगाबहन वैद्यको ७ देखता हूँ कि तुम्हारा वर्ग बढ़ रहा है । काकासाहबकी बात मुझे तो पसन्द आई । सच्ची सेवा करनेवाली बहनें आश्रममें तैयार नहीं होंगी, तो कहाँ होंगी ? इसका जवाब तुम्हींको देना है । हम लोगोंका स्वास्थ्य इस लायक नहीं है, न हममें इतनी आत्मशक्ति या अक्षरज्ञान ही है । परन्तु हममें शुद्ध भक्ति हो, तो यह सब अपने आप आ जायेगा । भक्तिका अर्थ है श्रद्धा, ईश्वरके प्रति और अपने प्रति। यह श्रद्धा ही हमसे सारे त्याग कराती है। त्यागके लिए त्याग करना मुश्किल होता है, परन्तु सेवाके निमित्त त्याग आसान हो जाता है । कोई माता यों ही जान-बूझकर गीलेमें नहीं सोती, मगर अपने बच्चेको सूखेमें सुलाने के लिए खुश होकर गीलेमें सो रहती है। मैं देख रहा हूँ कि इस वर्ष लम्बे समयतक में आश्रम में नहीं रह सकूंगा । इसका मुझे दुःख है, किन्तु हमें तो दुःखमें ही सुख मानना है। खादीके कामके लिए मुझे भ्रमण करना ही पड़ेगा। लाखों लोगोंको खादीका मन्त्र इसी तरह घूमकर ही दिया जा सकता है । गुजराती (जी० एन० ३६३६) की फोटो नकलसे । चि० गंगाबहन, ७. पत्र : गंगाबहन वैद्यको बापूके आशीर्वाद मौनवार, पौष वदी ६ [२४ जनवरी १९२७] इस बार तुम्हारी साप्ताहिक चिट्ठी अभीतक नहीं मिली है। तुम्हें अधीर तो होना ही नहीं चाहिए, लोभ भी नहीं करना चाहिए । बहुत काम करनेका लोभ कुछ भी नहीं करने देता । अतः थोड़ा किन्तु यथाशक्ति पूरा काम करनेकी वृत्ति रखनी चाहिए। यह इसलिए लिख रहा हूँ कि काकासाहब तुम सभी बहनोंको खूब प्रोत्साहित कर रहे हैं। उनका प्रोत्साहन देना मुझे अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि इस प्रोत्साहनके परिणामस्वरूप यदि हम फौरन कुछ करके दिखा सकें तो अच्छा होगा । किन्तु काम जल्दी तो तभी करके दिखाया जा सकता है जब हम पहले अपनी सामर्थ्यको आँककर, जितना हमारे बूतेका है, उतना ही काम अपने जिम्मे लें । गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८७०२) से । सौजन्य : गंगाबहन वैद्य बापूके आशीर्वाद १. गंगाबहनकी साप्ताहिक चिट्ठीके उल्लेखसे लगता है कि यह पत्र १९२७ में लिखा गया होगा, क्योंकि गंगाबद्दन दिसम्बर, १९२६ में आश्रमकी महिलाओंकी प्रधान चुनी गईं थीं। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/४५
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