भाषण : मुजफ्फरपुरके तिलक मैदान में १५ पर स्कूलों-कालेजोंसे बाहर आ गये थे, और जिन्होंने अपनी अच्छी चलती हुई वकालतकी अच्छी आमदनीको छोड़ दिया था, उन्होंने उन लोगोंको, धन्यवाद दिया और कांग्रेस कमेटीको इन देशभक्त नौजवानोंकी चर्चा करनेके लिए विशेष रूपसे धन्यवाद दिया । कांग्रेस कमेटीके अभिनन्दनपत्र में राष्ट्रीय इतिहासके एक बहुत पुराने और अल्प कालकी चर्चा की गई है। वह काल बहुत ही भव्य था और उसकी स्मृति मेरे लिए कितनी पुनीत है; किन्तु में कांग्रेसकी किसी अन्य गतिविधिके विषयमें कुछ नहीं कहना चाहूँगा । निश्चय ही वे महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन मेरे लिए देशकी वर्तमान परिस्थितियों में खद्दर-कार्य सबसे अधिक महत्त्वका कार्य है । भाषण जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि यदि आप खद्दर कार्यको ही सफल बना सकें तो [ देखेंगे ] केवल खद्दर ही आपकी अक्षुण्ण शक्तिका स्रोत है। स्वराज्य आपके द्वारपर होगा। जबतक आप भारतके गरीब लोगों की हालतपर सहानुभूतिपूर्वक ध्यान देना नहीं सीख लेते हैं, तबतक आपको स्वराज्यकी माँग करनेका कोई हक नहीं है और जबतक आप उनसे सहानुभूतिका भाव नहीं रखने लगते, तबतक आप स्वराज्यके सच्चे पक्षपोषी भी नहीं हैं। जबतक देशमें एक भी गरीब ऐसा है जो भूखा रहता हो, तबतक भारतके स्वराज्यका मेरे लिए कोई अर्थ नहीं है। भूखोंको भोजन देना, प्यासोंको पानी देना हर प्राणीका धार्मिक कर्त्तव्य है और उन्होंने कहा कि जबतक हर व्यक्तिमें ऐसी उदात्त भावना नहीं भर जाती, धर्मराज्य नहीं मिल सकता। इस धर्मका आचरण आप कैसे कर सकते हैं ? खद्दर, केवल खद्दर हीके द्वारा। मुझे और कोई दूसरा बेहतर उपाय किसीने नहीं सुझाया है और मेरा विश्वास है कि कोई दूसरा बेहतर तरीका है भी नहीं । इसके बाद उन्होंने खद्दरका आर्थिक पहलू विस्तारसे समझाया और बिलकुल साफ करके बताया कि किस तरह खद्दरपर खर्च की गई प्रत्येक पाई गरीबोंकी जेबमें जाती है। क्या आपको उन गरीब गाँववालोंकी इतनी भी मदद नहीं करनी चाहिए, जो आपको रोजमर्राकी रोटी मुहैया करते हैं ? गरीब और जरूरतमंद लोगोंकी मदद करना हर प्राणीका धार्मिक कर्तव्य है । क्या आप अपने इस कर्त्तव्यसे चूकेंगें ? खादी भले ही खुरदरी हो, महँगी हो, फिर भी वह आपकी माँका दिया हुआ उपहार है। क्या आपको वह अमूल्य उपहार उठाकर अलग फेंक देना चाहिए? आपको तो चाहिए कि आप विदेशी वस्त्रको खुरदरा और मंहगा समझें और खादीके टुकड़ोंको बड़े आदरसे सिर-माथ रखें । [ अंग्रेजीसे ] सर्चलाइट ३०-१-१९२७ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/५३
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