५०४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय जहाँतक तुम्हारे भोजन सम्बन्धी व्रतकी बात है, अतीतके अनुभवोंको ध्यान में रखते हुए पुनर्विचार किये बिना व्रतको लम्बा मत बनाओ । फिलहाल तुम व्रतकी भावनाके अनुरूप रह सकती हो अर्थात् केवल स्वाद अथवा प्रसन्नताके लिए कुछ मत खाओ। कोई वस्तु यदि स्वास्थ्यके लिये आवश्यक हो या फिर वही चीजें अगले भोजन में नहीं मिल सकती हों, तो खाद्य-पदार्थोंकी संख्या बढ़ाने में संकोच मत करो । इस समय में रिवाड़ी आश्रमके बारेमें कुछ नहीं कह रहा हूँ क्योंकि मुझे वहाँकी नवीनतम घटनाओंके बारेमें कुछ पता नहीं है। कृष्णनन्दजीने कभी नहीं लिखा । उनका यह सुझाव एक मौलिक सुझाव है कि मुझे भाँग लेनेकी आवश्यकताको समझना चाहिए । डाक्टरने आज ( रविवारको ) मेरी परीक्षा की है और वह मेरी प्रगतिसे सन्तुष्ट है । सस्नेह, अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२४०) से । सौजन्य : मीराबहन ४८९. पत्र : सतकौड़ीपति रायको बापू कुमार पार्क बंगलोर १२ जून, १९२७ प्रिय सतकौड़ी बाबू, मुझे आपका लम्बा और पूरी जानकारी देनेवाला पत्र मिला । कृपया आप क्षमा मत माँगिए । यदि में ठोस सेवा नहीं कर सकता तो ऐसा मित्र होनेके नाते, जिसकी पूरी समवेदना आपकी परेशानियोंमें आपके साथ है, आपको कमसे कम सान्त्वना तो दे ही सकता हूँ । आपने कभी अवसर पड़नेपर, भविष्य में मेरे उपयोगके लिए जो ब्योरेवार सूचना दी है; उसे मैं हमेशा याद रखूंगा । परन्तु अपनी कठिनाईपर विजय पानेके लिए जो रकम आप चाहते हैं, वह में नहीं जुटा सकूंगा। इस दौरान में इस बातपर जोर दूंगा कि आप अपना ध्यान अपनी वकालत जमानेपर पूरी तरह केन्द्रित करें। मुझे इस समय इससे बच निकलनेका और कोई उपाय नजर नहीं आता। मैं समझता हूँ कि यह बुरी चीज है । परन्तु हमें सदा अपनी मनपसन्दकी या अच्छी चीजें नहीं मिलतीं । स्पष्ट ही इस समय वकालत आपका स्वधर्म है; और इसलिए आपके लिए सर्वोत्तम है । परन्तु क्या आप यह निश्चय नहीं करेंगे कि चाहे आपकी वकालत कितनी ही क्यों न चले, आप आगेसे विवाहोंपर खर्च नहीं करेंगे? मेरे जीवनमें वह आये या नहीं परन्तु ऐसा समय आ रहा है Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/५४२
दिखावट