पत्र : गुलजारीलाल नन्दाको ५१३ करे। फिलहाल हमें इतने भरसे ही सन्तोष कर लेना ठीक होगा कि बदलेकी आशा किये बिना हम उचित काम करते चलें । इसलिए हमें पूंजीपतियोंसे किसी आर्थिक सहायताकी आशा नहीं करनी चाहिए। श्रमिकोंको अपनी स्थिति धीरे-धीरे अच्छी बनानी पड़ेगी और बिना किसी बाहरी सहायताके स्वतन्त्र रूपसे अपनी दशा सुधारनी होगी। बाहरी सहायताको दो भागोंमें बाँटा जा सकता है: एक तो पूँजीपतियोंसे इस मामलेमें मिल-मालिकोंसे -- जिनका इससे सीधा सम्बन्ध है, प्राप्त होनेवाली सहायता, दूसरी सामान्य रूपसे सहानुभूति रखनेवाली जनतासे मिलनेवाली सहायता । दूसरी सहायता हमें अधिक शीघ्रतासे और किसी भी तरह अपने हितको खतरेमें डाले बिना मिलेगी। सीधा सम्बन्ध रखनवाले पूँजीपतियोंसे यह सहायता तभी प्राप्त होगी जब श्रमिक अपनी स्थिति पुष्ट कर लें और करीब-करीब अपनी शर्त मंजूर करवाने योग्य हो जायें । केवल तभी हम पूँजीपतियोंकी स्वेच्छापूर्वक दी गई सहायता पा सकेंगे इससे पहले कतई नहीं। यदि मेरा निदान सही है तो हमें अपने मामलोंका प्रबन्ध इस तरह करना चाहिए कि हम केवल ऐसा कार्य स्वीकार करें जिसे हम बाहरी सहायताकी अपेक्षा किये बिना कर सकें। जब आवश्यकताओंको बढ़ाना हो तो हम बाहरके स्वतन्त्र व्यक्तियोंके पास जायें और ऐसे बाहरके व्यक्तियोंके पास कभी न जायें जिनके निहित स्वार्थ हों । परन्तु जब हमें अन्तिम स्रोत [ पूँजीपतियों से स्वेच्छा- पूर्वक सहायता मिले तो उसे अस्वीकार कर देनेकी जरूरत नहीं है। हम अपनी कार्य-प्रणालीको सदा ऐसा रूप दें कि हम किसी भी तरहकी बाहरी सहायतापर अपनेको आश्रित न समझें । इसलिए हमारा सारा ध्यान श्रमिकोंमें अंदरूनी जागृति पैदा करनेपर होना चाहिए एवं यह काम भी मुख्यतः स्वयं श्रमिकों द्वारा जुटाए गए साधनों द्वारा किया जाना चाहिए। मेरे विचारमें श्रमिकोंकी सेवा करनेका यह सबसे आसान और छोटा रास्ता है । निस्सन्देह आरम्भिक दशामें इससे बड़ी कठिनाई एवं बड़ी झंझट होगी और स्वयं श्रमिकोंकी ओरसे कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी। परन्तु इसी कारणसे हमें उस रास्तेको अपनाने का आग्रह रखना चाहिए, जिसे हम जानते हैं कि यही सबसे अच्छा रास्ता है। दूसरे तरीकेसे श्रमिक कंगाल एवं उत्साहहीन हो जायेंगे जैसा कि सारे भारतमें नजर आ रहा है। इस सिद्धान्तको लागू करते हुए मैं यह हल सुझाऊँगा कि मिल मालिकोंके साथ मान एवं स्वाभिमानके अनुरूप समझौता जारी रखा जाये। परन्तु इस समय जो सहायता मिल रही है, उसके बिना भी काम चलानेके लिए तैयार रहा जाये । आपको स्कूल चालू रखनेके लिए साधन एवं उपाय अवश्य ढूँढ़ निकालने चाहिए। देखिये, हमारे अपने क्या साधन-स्रोत हैं । सारी समस्याको संघके सामने रख दें और उसी समय निजी मित्रोंमें चन्देके लिए प्रचार करें और उसके बाद जनतासे भी अपील करें। जनताकी सहायता पा सकने में किसी कठिनाईकी पहलेसे ही आशंका मैं नहीं करता हूँ। और जनतासे जो भी अपील की जाये, वह किन परिस्थितियोंमें करनी पड़ रही है, उनका संक्षेपमें हवाला दिया जाये। इसमें मिल मालिकोंकी कुछ आलोचना की जायेगी । परन्तु उसके बिना काम नहीं चल सकता। मुझे नहीं मालूम कि मैंने अपना रुख पूर्णतः स्पष्ट कर दिया है ३३-३३ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/५५१
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