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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/५६१

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परिशिष्ट ५२३ रही, पढ़ती रही; और ज्यों-ज्यों पढ़ती गई, त्यों-त्यों मेरे हृदयका प्रभात अधिकाधिक उज्ज्वल होता गया । और जब मैंने इसे खत्म किया उस समय सत्यका सूर्य मेरी आत्मामें अपनी किरणें उँडेल रहा था । उसी क्षणसे मैंने जान लिया कि मेरा जीवन बापूको समर्पित है । जिस चीजकी में प्रतीक्षा कर रही थी वह आ गई है, और वह यही है । मैं सीधी लन्दन पहुँची और पी० एण्ड ओ० के दफ्तरमें जाकर हिन्दुस्तानका जहाजी टिकट खरीद लिया । साहित्य भी जितना मुझे मिल सका, ढूंढ निकाला और पढ़ डाला ; बापूकी रचनाएँ पढ़ीं, टैगोरकी रचनाएँ पढ़ीं, 'भगवद्गीता 'के फ्रेंच अनुवाद पढ़े और 'उपनिषदों' तथा 'वेदों 'में झाँककर भी देखा। लेकिन बहुत जल्दी मेरी समझमें आने लगा कि मेरा यह सोच लेना बेवकूफी है कि इस तरह मैं जल्दीसे बापूके पास पहुँच सकती हूँ। मैं आध्यात्मिक और शारीरिक दृष्टिसे बिलकुल अयोग्य थी और मुझे पहले अपनेको कठोर तालीम देनेकी जरूरत मालूम हुई। इसलिए मैं पी० एण्ड ओ० के दफ्तर में वापिस गई और टिकट बदलवाकर साल भर बादके लिए जगह सुरक्षित करवा ली । अब मैं सम्पूर्ण और व्यवस्थित ढंगसे काम करने लगी । पहले मैंने साबरमती आश्रमके नियमोंका पूरी तरह अध्ययन किया। उसके बाद एक-एक करके अपने खानेकी चीजें बदलने लगी, यहाँ तक कि मेरा भोजन शुद्ध शाका- हार हो गया । मैंने पलथी मारकर जमीनपर बैठना शुरू कर दिया । आरम्भमें लगातार दस मिनट ही बैठ सकती थी, परन्तु सतत अभ्याससे मैं बिलकुल आरामसे बैठने लगी । मैंने उर्दू पढ़ना शुरू कर दिया । और पींजना, कातना और बुनना भी सीख ही लिया । यह मजबूरन ऊनपर ही करना पड़ा, लेकिन इससे मेरा अभ्यास अच्छा हो गया। साथ- साथ साहित्यका अध्ययन भी जारी रहा। इस तालीमके दिनों अखबारोंमें खबर आई कि बापूने हिन्दू-मुस्लिम एकताके लिए २१ दिनका उपवास शुरू कर दिया है। जैसे- जैसे दिन बीतने लगे, अखबारोंने कहना शुरू कर दिया कि बापू शायद बचेंगे नहीं। मैं व्यथित मनसे ईश्वरसे प्रार्थना करती थी । धीरे-धीरे दिन गुजरते गये। लेकिन मैंने अपनी तालीममें कभी ढिलाई न आने दी। क्योंकि मैं जानती थी कि बापूका शरीर चला जाये, तो भी मुझे उनका काम करनेके लिए हिन्दुस्तान जरूर जाना है । २१ दिन एक युगकी तरह बीते । परन्तु अन्तमें यह समाचार आया कि बापूका उपवास सकुशल टूट गया है । उस वक्त तक मैंने बापूको एक शब्द भी नहीं लिखा था। लेकिन उपवासके सफलतापूर्वक समाप्त होनेपर मेरा हृदय आनन्द और कृतज्ञतासे इतना भर गया कि मुझे लिखना ही पड़ा । [ अंग्रेजीसे ] बापूज लेटर्स टु मीरा Gandhi Heritage Portal