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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५१२

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३९९. भाषण : आरनी में ' २ सितम्बर, १९२७ आप मन्दिरोंसे कपड़ेका एक टुकड़ा, या नारियल या प्रसाद के तौरपर कुछ भी पाकर प्रसन्न होते हैं। लेकिन अफसोस, मन्दिरोंसे सारी पवित्रता चली गई है । मैं तो आपसे यही कहूँगा कि आप प्रसादके बजाय खादीके लिए श्रद्धा और भक्ति की भावना जगाइए। यह दरिद्रनारायणके जीवन्त मन्दिरमें काती और बुनी जाती है । हमारे धर्म और समाज में मन्दिरोंके लिए उचित स्थान वहींतक है जहाँ- तक वे हमें भारत के करोड़ों भूखे नंगे लोगोंकी ओर मंत्री और भ्रातृत्वका हाथ बढ़ानेकी प्रेरणा देते हैं। लेकिन, यदि ये मन्दिर हमारे और सर्वसाधारणके बीच दीवारें बनकर खड़े होते हैं तो ये हमें बाँधनेवाली बेड़ीकी कड़ियाँ ढालने के साधन मात्र हैं । यदि आप सच्ची भावनासे खादी पहनेंगे तो आप स्वयंको और इन मन्दिरोंको भी पवित्र बनायेंगे । आपको यह समझानेकी जरूरत नहीं है कि इससे किस प्रकार अनिवार्यतः अस्पृश्यता निवारण में सहायता मिलेगी । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ८-९-१९२७ ४००. भाषण : अर्काटमें २ सितम्बर, १९२७ आपके हार्दिक स्वागत और थैलीकी भेंटके लिए मैं आपका बड़ा आभारी हूँ । परन्तु मैं इतनी रकमसे सन्तुष्ट होनेवाला नहीं हूँ। मैं जानता हूँ कि इस सभा में अनेक लोग हैं, जिन्होंने हमारे गरीब भाइयोंके लिए जमा किये गये इस कोषमें कुछ भी नहीं दिया है। आपको खद्दर पहनकर कताईको प्रोत्साहन देना चाहिए। मुझे यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि यहाँ हिन्दू और मुसलमान दोनों परस्पर सहयोगकी भावनासे एक साथ बैठते हैं । वे साम्प्रदायिक विद्वेषके शिकार उत्तर भारतके हिन्दुओं और मुसलमानोंके समान आचरण नहीं करते । कल जब मैं एक हिन्दू मन्दिर जा रहा था, रास्तेमें मुझे 'गुरुक्कल' पुजारीने प्रसाद दिया। मैंने उससे कहा कि मैं तो परिया हूँ और क्या आप किसी परियाको मन्दिर में प्रवेश करने देंगे। वह हँसने लगा और उसने कहा कि वह धीरे-धीरे वैसा करने लगेगा । मैं यहाँ उपस्थित सभी स्त्री-पुरुषोंसे अनुरोध करता हूँ कि परिया लोगोंको बराबरीका दर्जा दीजिए और उनके साथ बेहिचक मिलिए-जुलिए । १. महादेव देसाईके " साप्ताहिक पत्र " से । Gandhi Heritage Portal