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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५१९

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भाषण : मद्रासमें विद्यार्थियोंके समक्ष

आप उसका खण्डन करने लगें। और यदि आपने खादीके इस सन्देशको समझ लिया हो तो आप तबतक चैनकी साँस नहीं लेंगे जबतक कि आप एक-एक इंच विदेशी कपड़ेको त्यागकर उसके बदले हाथकते सूतकी हाथबुनी खादी न अपना लें।

परन्तु मैं बता चुका हूँ कि खादी तो वास्तवमें आपके कामका एक बहुत ही छोटा-सा अंग है। यह तो सेवाकी शुरुआत है और एक केन्द्रबिन्दु है जिसके चारों ओर दूसरी सभी प्रवृत्तियोंका आरम्भ और विकास किया जा सकता है। भारतके गाँवोंसे भयंकर गरीबीको दूर करनेके इस सवालको हल करनेके लिए आपको अपना चरित्र ऐसा बनाना पड़ेगा जिसपर कोई भी अँगुली न उठा सके। इस चरित्र-रूपी संयोजक तत्त्वके बिना आप समाजके बिखरे अवयवोंको जोड़ नहीं पायेंगे। मुझे भरोसा है कि मुझसे यह सुनकर आपकी आत्माको बड़ा बल मिलेगा कि आजकल गुजरातके विद्यार्थी बाढ़ग्रस्त क्षेत्रोंमें आश्चर्यजनक काम कर रहे हैं। यदि उनके हृदयमें विपत्तिग्रस्त लोगोंके लिए अपार प्रेम न उमड़ रहा होता और इस सेवाके पीछे उनकी सच्चरित्रता न होती तो वे यह सब नहीं कर सकते थे। इनमेंसे कुछ अपनी पढ़ाई छोड़कर, कंधोंपर कुदालियाँ, फावड़े और टोकरियाँ लेकर गाँवोंमें चले गये हैं और उन्होंने मृत पशुओं तथा सड़े अनाजकी दुर्गन्धसे भरे उन गाँवोंको फिरसे आदमियोंके रहने योग्य बना दिया है। उन्होंने इसका इन्तजार नहीं किया कि मरे हुए पशुओंको पंचमवर्णके भाई ही आकर उठायें, बल्कि खुद ही लाशोंको हटा दिया। और मैं जानता हूँ कि चन्द गुजराती विद्यार्थी जो कर सके हैं, अवसर मिलनेपर आपमेंसे हर युवक या युवतीके लिए भी वैसा करना सम्भव है। अब मुझे आपका ज्यादा वक्त नहीं लेना चाहिए और न स्वयं इतना बोलना चाहिए कि मद्रास आनेके पहले ही दिन अपने-आपको बिलकुल थका लूँ। वैसे और भी बहुत-सी बातें हैं जिनके बारेमें मैं आपसे बात करना चाहता था। मैं तो चाहता था कि उनके विषयमें भी बात करनेका समय मेरे पास होता। पर मैं आपसे एक छोटा-सा अनुरोध अवश्य करूँगा। वेल्लूरके विद्यार्थियोंके समक्ष मैंने एक काफी सुविचारित भाषण दिया था[१] और मुझे बताया गया है कि समाचारपत्रोंने उसे पूरा का पूरा, लगभग शब्दशः प्रकाशित किया है। आपमेंसे कुछने वह शायद पढ़ भी लिया होगा। पर जिन लोगोंने पढ़ लिया है उनको भी एक बार फिर सावधानीसे उसे पढ़ना चाहिए और जिन्होंने नहीं पढ़ा है, उनसे मेरा अनुरोध है कि किसीसे लेकर या खरीदकर उसे पढ़ अवश्य लें। भविष्यको आपसे बड़ी आशा है और मेरी बड़ी अभिलाषा है कि भारत-भरके विद्यार्थी यह महसूस करें कि इस देशमें जन्म लेनेके कारण ही नहीं, बल्कि दबे-पिसे गरीब ग्रामवासियोंके खून-पसीनेके पैसोंके बलपर शिक्षित बन पानेके कारण भी इस देशके प्रति उनका क्या कर्तव्य हो जाता है। जब भी स्वार्थ आपके ऊपर हावी होने लगे और आप देशको भुलाकर सिर्फ अपने स्वार्थकी बात सोचने लगें, उस समय आप मेरी इन बातोंको जरूर याद कर लीजिए — उन बातोंको जो मैंने आज शाम आपसे कही हैं। आप हमेशा याद रखिए कि शिक्षा प्राप्त करनेके दौरान आपके

  1. ↑ देखिए “भाषण : वेल्लूरके वूरीज़ कालेजमें”, ३०-८-१९२७।