४८८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय वेल्लूर में मुझे एक मिशनरी मित्रके साथ कुछ अत्यन्त ही मूल्यवान क्षण बितानेका अवसर मिला था । उस स्थान के विद्यार्थियोंके साथ दिल खोलकर मेरी बातचीत हुई । अगले दिन सुबह उन्होंने मेरे सामने कुछ इस प्रकारके उद्गार व्यक्त किये : आपका भाषण बड़ा अच्छा रहा। आपने आत्मासे सम्बन्धित बातें कहीं। परन्तु उन सबके बीच यह खादीका सवाल कहाँसे टपक पड़ा ? क्या आप बतायेंगे कि खादीका आध्या- त्मिकतासे क्या सम्बन्ध है ? ' फिर उन्होंने कहा : 'आपने शराबबन्दीकी बात की जिससे हमें खुशी हुई; वह सचमुच आध्यात्मिकतासे सम्बन्धित है । आपने अस्पृश्यताकी बात की, वह आध्यात्मिकता में रुचि रखनेवाले श्रोताओंके सुननेका या आध्यात्मिक प्रवृत्तिके व्यक्तिके बोलनेका एक बड़ा सुन्दर विषय था । पर आपके भाषणमें ये दोनों बातें खादीके सन्देशके बाद ही आईं। हममें से कुछको यह ठीक नहीं लगीं।' मैंने उस बातचीतका सारांश आपको अपने शब्दोंमें ज्योंका-त्यों बतलाया है, अपनी ओरसे उसमें कोई पुट नहीं दिया है । उस समय मुझे जैसा सूझा वैसा उत्तर मैंने दे दिया था। अब आज सुबह मैं उसीकी विस्तार से चर्चा कर रहा हूँ । बात बिलकुल सच है कि मैं खद्दरको सबसे पहले स्थानपर और अस्पृश्यता तथा शराबबन्दीको उसके बाद रखता हूँ । ये सब बातें मैंने वेल्लूरके विद्यार्थियोंके समक्ष दिये गये अपने उस भाषणके अन्तमें कहीं थीं जिसमें मैंने उनसे आग्रह किया था कि वे अपने जीवन में पवित्रता लायें, क्योंकि पवित्रताके बिना उनका समूचा ज्ञान बिलकुल अनुपयोगी और शायद विश्वकी वास्तविक प्रगति के लिए बाधारूप बन जायेगा। इसके बाद मैंने दृष्टान्तके तौरपर ये तीनों बातें और अन्य कई बातें कहीं । संसारके अनेक भागों में निरन्तर सार्वजनिक सेवाका पैंतीस वर्षका अनुभव रखने के बाद भी में अभीतक यह नहीं समझ पाया कि कर्म और कर्मशीलतासे बिलकुल अलग-थलग कोई भी आध्यात्मिक या नैतिक मूल्य कैसे हो सकता है। में इस प्रकारकी सभाओंमें एक अत्यन्त सुन्दर वचन बहुधा सुनाता रहा हूँ। यह वचन जिस दिन मैंने पढ़ा था, उसी दिन से सदा मेरे मन में बसा रहता है । वह इस प्रकार है : " हर क्षण प्रभु-प्रभुकी रट लगानेवाला हर व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश नहीं पा जायेगा; वही प्रवेश पायेगा जो स्वर्ग में वास करनेवाले मेरे पिता (परमेश्वर ) को इच्छाके अनुसार कर्म करेगा । " में उसके शब्द ठीक क्रममें नहीं रख पाया हूँ, पर आप उसे जानते ही हैं और यह भी कि उसमें जो कहा गया है, बिलकुल सत्य कहा गया है। मुझे इंग्लैंडके सार्वजनिक नेताओंके दो बड़े शानदार उदाहरण याद आते हैं। दोनों ही अपने समयके बहुत बड़े सुधारक और आध्यात्मिकताके स्तम्भ माने जाते थे। मैं १८८९-९०की बात कर रहा हूँ। तब आपमें से अधिकांश पैदा भी नहीं हुए थे। मैं उन दिनों शराबबन्दीके सिलसिले में होनेवाली सभाओं में भाग लिया करता था। उस सुधारमें मेरी रुचि थी। आध्यात्मिकताके वे दोनों स्तम्भ शराबबन्दीका काम करनेवाले महारथी कार्यकर्त्ता माने जाते थे। लेकिन वे भाषण-शूर थे। जब भी १. देखिए " भाषण : वेल्लूरके वूरीज़ कॉलेज में ", ३०-८-१९२७ । २. सेंट मैथ्यू ७-२१ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२४
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