भाषण : वाई० एम० सी० ए०, मद्रासमें ४८९ शराबबन्दीको लेकर जोरदार भाषण कराना होता, उन्हींको बुलाया जाता था । उनकी बड़ी पूछ थी। पर मुझे दुःखके साथ कहना पड़ेगा कि मुझे उनका पतन भी देखना पड़ा। दोनोंका पर्दा फाश हो गया। वे कार्यकर्त्ता थे ही नहीं । ईश्वर, प्रभु, परमेश्वर इत्यादि शब्द सदा ही उनकी जवानपर रहते थे, पर केवल मुख-विलासकी तरह, हृदय में नहीं । नशाबन्दीके मंचका उपयोग वे अपनी गोटी लाल करनेके लिए करते थे । उनमें से एक सट्टेबाजी करता था और दूसरा अनैतिक अपराध । आप शायद समझ गये होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ। मैं भारत के बारेमें भी यह नहीं कह सकता कि यहाँ नशाबन्दीके आन्दोलनका मंच सदा आध्यात्मिकताके प्रचार-प्रसारके लिए ही प्रयुक्त होता है, अस्पृश्यता-आन्दोलनका मंच सदा आध्यात्मिकताका ही मंच होता है । मुझे पहलेकी स्थितिकी जानकारी रही है और इस समय जब मैं आपके सामने भाषण कर रहा हूँ तबकी स्थिति भी मैं जानता हूँ। वह यह है कि इस देश में भी कई लोग इन दोनों आन्दोलनोंके मंचोंका दुरुपयोग कर रहे हैं। बाकी लोग सदुपयोग करते हैं। इससे मैं यही निष्कर्ष निकालकर दिखाना चाहता हूँ कि काम कोई भी हो, उसको करने, देखने-समझने और दुनियाके समक्ष रखने में किसीका दृष्टि- कोण आध्यात्मिक भी हो सकता है और आध्यात्मिकतासे सर्वथा शून्य भी । मैं आज आपके सामने दावा करता हूँ कि चरखा और खादीका सन्देश एक परम आध्यात्मिक सन्देश है और चूँकि इस देशके लिए यह मुख्यतः एक आध्यात्मिक सन्देश है, इसीलिए यह बड़े-बड़े आर्थिक और राजनीतिक परिणामोंकी सम्भावनासे भी पूरित है । किसी कुछ ही दिन हुए मेरे एक अमेरिकी मित्र, प्रोफेसर सैम हिगिन बॉटमने एक ऐसे विषय के सम्बन्धमें मुझे लिखा था, जिसमें हम दोनोंकी गहरी रुचि है । मैं उनके पत्रका सारांश आपको बतला रहा हूँ। उन्होंने लिखा था : “ मैं अर्थशास्त्रसे रहित धर्म में विश्वास नहीं करता। धर्म यदि कामका है तो आवश्यकता पड़नेपर उसे अर्थशास्त्रीय आचरणके रूप में प्रस्तुत किये जाने योग्य होना ही चाहिए।" मैं उनके इस कथन की पूरी तरह ताईद करता हूँ, लेकिन एक बड़ी शर्तके साथ। मैं यह नहीं कहता कि श्री हिगिनवॉटमके दिमाग में भी यह शर्त लगाने की बात नहीं है । लेकिन उनके मन में क्या विचार है, यह मैं अधिकारपूर्वक कैसे कह सकता हूँ? मेरे मनमें जो शर्त है, वह यह है - यह तो ठीक है कि यदि धर्म किसी कामका है तो उसे अर्थशास्त्रीय आचरणके रूप में प्रस्तुत किये जाने योग्य होना चाहिए, लेकिन अर्थशास्त्रको भी, यदि वह किसी कामका है, तो धार्मिक या आध्यात्मिक आचरणके रूप में प्रस्तुत किये जाने योग्य होना चाहिए। इसलिए धर्म और अर्थशास्त्रकी इस योजनामें शोषण और, यदि ठेठ अर्थशास्त्रीय भाषाके एक शब्दका प्रयोग करूँ तो अमेरिकीकरणके लिए कहीं कोई स्थान नहीं है । भारतके एक प्रख्यात सुपुत्रने कहा है कि एक अंग्रेज के पास अगर ३० या शायद ३६ गुलाम - मुझे ठीकसे याद नहीं -- - हैं तो एक अमेरिकी ३३ गुलाम रखता है । यह उक्ति अन्य किसीकी नहीं, सर एम० विश्वेश्वरैयाकी ही है। मेरा अपना खयाल यह है कि धर्मके रूपमें प्रस्तुत किये जा सकनेवाले, सच्चे अर्थशास्त्रमें मनुष्यों या पशुओं या मशीनोंको गुलामोंके Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२५
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