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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२६

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४९० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय रूप में रखनेकी कोई गुंजाइश नहीं है। अर्थ-शास्त्र में गुलामीके लिए कोई गुंजाइश ही नहीं है । इसी आधारपर में आपसे कहता हूँ कि खादीको अपनाये बिना आपका काम नहीं चल सकता और खादीका क्षेत्र व्यापकतम है। नशाबन्दीके कामकी सीमा में कुछ थोड़े-से लोग आते हैं । यह शराबीसे शराबकी लत छुड़वा देनेवाले सुधारकको पवित्र बनाता है और समझानेपर अपनी लत छोड़ देनेवाले शराबीको तो पवित्र बनाता ही है। अस्पृश्यता निवारणके कामका असर इस अभागे देशके ज्यादासे ज्यादा सात करोड़ लोगोंपर होगा और हर आदमी तो इस काम में आ नहीं सकता। आप अस्पृश्यको शिक्षित बना सकते हैं, उसके लिए कुएँ और मन्दिर बनवा सकते हैं, लेकिन इनसे तो वह स्पृश्य नहीं बन जायेगा । यह तो तभी होगा जब तथाकथित स्पृश्य लोग अपनी श्रेष्ठताका दम्भ त्यागकर अस्पृश्योंको भाइयोंकी तरह मानने लगेंगे । इस तरह आप पायेंगे कि सामान्य स्त्री-पुरुषोंके लिए यह समस्या कुछ पेचीदा ही है। मैंने अपना सारा जीवन - चाहे वह कितना भी तुच्छ हो - केवल सत्यकी खोजके लिए ही अर्पित कर रखा है। इसलिए मैं एक ऐसे साधनकी खोज में लगा हुआ था जिसे हर व्यक्ति - यहाँ जितने लोग उपस्थित हैं वे सभी बिना किसी अपवादके अपना सकें और जो साथ ही भारत देशकी सबसे बड़ी और गहरी पैठी व्याधिका उपचार भी हो सके । - और भारतकी सबसे गहरी पैठी बीमारी निश्चय ही शराबखोरी नहीं है और न अस्पृश्यता, यद्यपि ये बीमारियाँ अपने-आपमें काफी बड़ी हैं और जिन लोगोंको इन्हें भोगना पड़ रहा है उनके लिए शायद और भी बड़ी हैं। लेकिन, जब आप इस बातका जायजा लेंगे कि किस बीमारीसे कितने लोग पीड़ित हैं, यदि आप जन- गणनाके आँकड़ों अथवा इतिहासकी किसी प्रामाणिक पुस्तकको देखेंगे तो आप मेरे इस विचारसे अवश्य ही सहमत हो जायेंगे कि भारत की सबसे बड़ी बीमारी उसकी गरीबी है । प्रामाणिक इतिहास-पुस्तक के रूपमें आप सर विलियम हंटरकी पुस्तक ले सकते हैं, या चाहें तो अभी दो ही वर्ष पूर्व एक आयोगके सामने श्री हिगिनबाँटम द्वारा दिये बयानको भी देख सकते हैं। श्री हिगिनबाँटमने कहा था कि भारतके अधिक- तम लोग गरीबीके शिकार हैं। सर विलियम हंटर कहते हैं कि भारतकी आबादीके दशांशको मुश्किलसे एक वक्त और सो भी सूखी रोटी और चुटकी भर नमक खाकर रहना पड़ता है। आप और में तो इस भोजनको शायद स्पर्श भी नहीं करेंगे। आज यही भारतकी स्थिति है। यदि आप रेलमार्गसे दूर देहातके भीतरी हिस्सोंमें जायें तो मेरी ही तरह आप भी वहाँ देखेंगे कि गाँव, गाँव नहीं, कूड़ेके ढेर बनते जा रहे हैं; वहाँ ग्रामीण नहीं, चील और गिद्ध रहते हैं, क्योंकि ग्रामीण लोग अपने बलबूते अपना गुजारा भी नहीं कर सकते और वे जीती-जागती लाशें बनकर रह गये हैं । भारत गर्दन तोड़ बुखार (मेनिनजाइटिस) से पीड़ित है और अगर आप आवश्यक शल्य चिकित्सा करना चाहते हैं, भुखमरीसे पीड़ित करोड़ों लोगोंको थोड़ा-कुछ देना चाहते हैं, तो आपके पास उसका एकमात्र साधन खादी ही है । और यदि आध्यात्मिक प्रवृत्तिवाले लोगोंके रूपमें आपके मन में उन लोगोंके प्रति कोई हमदर्दी हो जो आपकी- Gandhi Heritage Portal