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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२७

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भाषण : वाई० एम० सी० ए०, मद्रासमें ४९१ जैसी अच्छी अवस्था में नहीं हैं और जिनके पास इतना भी नहीं है कि वे गुजारा कर सकें और अपने तन ढँक सकें और यदि आप उनके साथ अपना अटूट सम्बन्ध जोड़ना चाहें, तो मैं एक बार फिर कहता हूँ कि खादीके अतिरिक्त उसका और कोई साधन नहीं है । लेकिन यह बात आपके कानोंको खटकती है और खटकनेका कारण यह है कि यह एक बिलकुल नया विचार है और कई लोगोंको यह मात्र एक काल्पनिक दिवा स्वप्न जैसा लगता है । वेल्लूरके जिन मिशनरी मित्रका मैंने जिक्र किया है, उन्होंने बातचीत के अन्तमें मुझसे कहा था : "ठीक है, पर क्या आप आधुनिक प्रगति के बढ़ते हुए चरण रोक सकते हैं ? क्या आप घड़ीकी सुइयाँ पीछे की ओर घुमा सकते हैं? क्या आप लोगोंको खादी अपनाकर चन्द कौड़ियोंके लिए काम करनेको राजी कर सकते हैं ? " में इससे अधिक कुछ नहीं कह सका कि आप अपने भारत देशको बिलकुल नहीं जानते । वेल्लूरसे में अर्काट और आरनी गया। मुझे वहाँ लोगोंके अधिक सम्पर्क में आनेका समय नहीं मिल पाया, पर में आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने वहाँ गाँववालोंको इतना कम कपड़ा पहने देखा, जितना कम मेरे शरीरपर भी नहीं है। ऐसे दस-बीस नहीं, हजारों लोग मैंने देखे । वे चिथड़े पहने हुए थे और सालमें चार महीने उनको मजदूरीके नामपर एक पैसा भी नहीं मिलता। उन्होंने अपना पेट काटकर मुझे चन्दा दिया। में उनके दिये हुए दानको सतृष्ण नेत्रोंसे देख रहा था। उन्होंने मुझे चन्देमें पैसे नहीं, पाइयाँ दी थीं। नवम्बर में आप मेरे साथ उड़ीसा चलकर वहाँ पुरीको देखिए । यह एक तीर्थ- स्थल है, जहाँ एक आरोग्यशाला ( सेनेटोरियम) भी है। गर्मियों में वहाँ सैनिक और गवर्नर रहा करते हैं। उसी पुरीके इर्द-गिर्द दस मीलके अन्दर ही आपको चलते-फिरते नरकंकाल देखनेको मिलेंगे। इन्हीं हाथोंसे मैंने उन नरकंकालोंसे चन्देमें मोरचा लगी पाइयाँ इकट्ठी की हैं जिन्हें उन्होंने बड़े जतन से अपने चिथड़ोंमें बाँध रखा था । कोल्हापुर में [ पक्षाघातका हलका-सा दौरा पड़नेपर ] मेरे हाथ जितने काँप रहे थे, ये पाइयाँ देते हुए उनके हाथ कहीं अधिक काँप रहे थे। आप उनके सामने जरा आधुनिक प्रगति की बात करके तो देखिए। आप उनके सामने ईश्वरका नाम लेकर देखिए । वह उनके लिए कोई मतलब नहीं रखता, ईश्वरका नाम लेना उनका अपमान करना होगा। यदि मैं या आप उनके सामने ईश्वरकी बात करेंगे तो वे हमें दुष्ट और बदमाश कहेंगे। यदि वे किसी ईश्वरको जानते हैं तो उस ईश्वरको जो उनके लिए त्रासका कारण बना हुआ है, उनपर अपना क्रोध उतारता रहता है, और जो निष्ठुर और आततायी है । वे नहीं जानते कि प्रेम क्या चीज होती है । आप उनके लिए क्या कर सकते हैं ? ( उपस्थित स्त्रियोंकी ओर संकेत करते हुए) इन प्रसन्न वदना बहनोंको रेशमी साड़ियाँ छोड़कर उन काँपते हुए रुक्ष हाथोंसे बुनी खुरदरी खादी पहननेके लिए राजी कर पाना आपके लिए मुश्किल होगा। क्यों नहीं ! खादी खुरदरी है, भारी है ! रेशमका स्पर्श बड़ा सुखद होता है। रेशमी साड़ियाँ तो ९-९ गजकी पहनी जा सकती हैं ! मगर खादी तो नहीं पहनी जा सकती। मगर उड़ीसाकी गरीब बहनोंके पास पहननेको साड़ियाँ नहीं, फटे-पुराने चिथड़े हैं। फिर भी Gandhi Heritage Portal