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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३५

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पत्र : आश्रमकी बहनोंको

पाता, वह ऐसा मानता है कि उन्हें कोई भी नहीं जीत सकता और यह ठीक है। इसलिए संसार द्वारा शक किये जानेपर हमें क्रोधित नहीं होना चाहिए। ऐसा मानना चाहिए कि वहाँ आश्रममें रहनेवाले सब लोग भी जगत्‌में आ जाते हैं।

तुमने पवित्र मनसे जो छूट ली, वैसी ही छूटोंके कारण दूसरे लोगोंका पतन होते देखा गया है। शुरूमें वे लोग भी निर्दोष थे। यदि तुम उन लोगोंकी कोटिमें भी पहुँच गये हो जो कभी विकारवश नहीं होते, तो भी दूसरोंके हितकी दृष्टिसे तुम्हें मर्यादाका पालन करना चाहिए। ब्रह्मचर्यका दावा करनेवाले तो बहुत-से देखनेमें आते हैं। क्या हम उन सबको स्वतन्त्रता दे सकते हैं?

मैं स्वयं अभीतक विकारोंको जीत नहीं पाया हूँ, तुम्हें यह मालूम है अथवा नहीं? यदि मैं अपने विषयमें स्वयंको अथवा जगत्‌को आश्वस्त नहीं कर सकता, तो फिर तुम्हें तो अपने विषयमें बहुत सावधान रहना चाहिए।

काम बिच्छू है। वह कब डंक मार देगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। वह तो अनंग है, इसलिए हम उसे देख नहीं सकते। हम चाहें तो भी उसे पकड़ नहीं सकते। इसीलिए ब्रह्मचारीको निरन्तर जागरूक रहना पड़ता है।

तुम भाई छगनलाल जोशी इत्यादिके विषयमें जो कुछ लिखते हो, सो ठीक नहीं है। वे सब प्रयत्नशील हैं। हम जगत्‌से बाहर तो नहीं रहते, किन्तु फिर भी उसमें रहते हुए दूसरोंके विकारोंके प्रति द्वेष-दृष्टि न रखते हुए स्वयं निर्विकार बनने और रहनेकी इच्छा करते हैं। इसलिए तुम सावधान रहना। यदि तुम कुछ और भी पूछना चाहो, तो पूछना।

[गुजरातीसे]

महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी। सौजन्य : नारायण देसाई

४१३. पत्र : आश्रमकी बहनोंको

मौनवार [५ सितम्बर, १९२७][१]

बहनो,

तुम्हारी चिट्ठी मिली। आश्रमकी मजदूरिनोंके निकट सम्पर्कमें आनेकी मेरी बातका रहस्य तुम लोगोंने समझ लिया होगा। उनसे संकट निवारणके लिए दो-चार कौड़ी प्राप्त कर लेना तो एक निमित्त-भर है। अभिप्राय यही है कि तुम लोग इस अवसरका लाभ उठाकर उनके साथ अपनेपनका सम्बन्ध बनाओ। वे हमें और हम उन्हें समझें और एक-दूसरेके

  1. ↑ आश्रमकी मजदूरिनोंके निकट सम्पर्कमें आनेकी बातके आधारपर।