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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३५

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पत्र : आश्रमकी बहनोंको ४९९ पाता, वह ऐसा मानता है कि उन्हें कोई भी नहीं जीत सकता और यह ठीक है । इसलिए संसार द्वारा शक किये जानेपर हमें क्रोधित नहीं होना चाहिए। ऐसा मानना चाहिए कि वहाँ आश्रम में रहनेवाले सब लोग भी जगत् में आ जाते हैं । तुमने पवित्र मनसे जो छूट ली, वैसी ही छूटोंके कारण दूसरे लोगोंका पतन होते देखा गया है। शुरूमें वे लोग भी निर्दोष थे । यदि तुम उन लोगोंकी कोटिमें भी पहुँच गये हो जो कभी विकारवश नहीं होते, तो भी दूसरोंके हितकी दृष्टिसे तुम्हें मर्यादाका पालन करना चाहिए। ब्रह्मचर्यका दावा करनेवाले तो बहुत-से देखने में आते हैं। क्या हम उन सबको स्वतन्त्रता दे सकते हैं ? मैं स्वयं अभीतक विकारोंको जीत नहीं पाया हूँ, तुम्हें यह मालूम है अथवा नहीं ? यदि में अपने विषय में स्वयंको अथवा जगत्को आश्वस्त नहीं कर सकता, तो फिर तुम्हें तो अपने विषय में बहुत सावधान रहना चाहिए । काम बिच्छू है । वह कब डंक मार देगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। वह तो अनंग है, इसलिए हम उसे देख नहीं सकते। हम चाहें तो भी उसे पकड़ नहीं सकते । इसीलिए ब्रह्मचारीको निरन्तर जागरूक रहना पड़ता है । तुम भाई छगनलाल जोशी इत्यादिके विषय में जो कुछ लिखते हो, सो ठीक नहीं है । वे सब प्रयत्नशील हैं। हम जगत् से बाहर तो नहीं रहते, किन्तु फिर भी उसमें रहते हुए दूसरोंके विकारोंके प्रति द्वेष-दृष्टि न रखते हुए स्वयं निर्विकार बनने और रहने की इच्छा करते हैं । इसलिए तुम सावधान रहना । यदि तुम कुछ और भी पूछना चाहो, तो पूछना । [ गुजरातीसे ] महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी । सौजन्य : नारायण देसाई बहनो, ४१३. पत्र : आश्रमकी बहनोंको मौनवार [५ सितम्बर, १९२७] तुम्हारी चिट्ठी मिली । आश्रमकी मजदूरिनोंके निकट सम्पर्क में आनेकी मेरी बातका रहस्य तुम लोगोंने समझ लिया होगा। उनसे संकट निवारणके लिए दो-चार कौड़ी प्राप्त कर लेना तो एक निमित्त-भर है । अभिप्राय यही है कि तुम लोग इस अवसरका लाभ उठाकर उनके साथ अपनेपनका सम्बन्ध बनाओ। वे हमें और हम उन्हें समझें और एक-दूसरेके १. आश्रमकी मजदूरिनोंके निकट सम्पर्क में आने की बातके आधारपर । Gandhi Heritage Portal