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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४२

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५०६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय देखनेकी जनताको पूरी छूट है, जाँच करें और यदि उसमें किसी प्रकारके सुधारके लिए कोई सुझाव देना जरूरी हो तो दें । अन्तमें में प्रचारकोंसे यह कहना चाहता हूँ कि इस तरहके अन्य कार्योंकी तरह ही हिन्दी-प्रचारके कार्य में वे तभी सफल हो सकते हैं जब आदर्श जीवन व्यतीत करें और उनमें चारित्रक दृढ़ता हो। इस तरहके कार्यकर्त्ताओंके लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि उनमें अपने कामको सफल बनानेके लिए जुटे रहनेकी दृढ़ता और संकल्पका गुण हो । मुझे पूरा विश्वास है कि यदि अबतक सभी प्रचारकोंने इसे अपने जीवनका परम उद्देश्य नहीं बना लिया हो तो अब वे अवश्य बना लेंगे । [ अंग्रेजीसे ] हिन्दू, ६-९-१९२७ ४१७. पत्र : मीराबहनको [ ७ सितम्बर, १९२७] चि० मीरा, मैं बड़ी आकुलतासे तुम्हारे तारोंकी राह देखता हूँ। तार आते भी हैं, लेकिन उनमें मुझे मनको आश्वस्त करनेवाला समाचार नहीं मिलता। लेकिन हमको शिका- यत नहीं होनी चाहिए। रुग्णताका भी कुछ लाभ उठाना चाहिए और उसे प्रसन्नता- पूर्वक झेलना चाहिए। तुम्हारा आखिरी तार अभी-अभी मिला। उसमें बताया गया है कि अब शायद ज्वर काबू में आ गया है। ईश्वर करे, ऐसा ही हो। मैं अक्सर तुम्हें तार देनेकी सोचता हूँ, लेकिन फिर अपने मनसे कहता हूँ कि मुझे ऐसा करनेका अधिकार नहीं है। लेकिन मेरी शुभकामनाएँ और मेरे आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ हैं । सुख और दुःखको समभावसे स्वीकार करना, यही 'गीता' की सीख है । सस्नेह, अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२७१) से । सौजन्य : मीराबहन । बापू १. इसे स्पष्ट करते हुए मीराबहनने लिखा है : " उस समय मुझे मलेरियाका तेज बुखार आ रहा था; मेरा तापक्रम १०५° से भी अधिक हो गया था। ” Gandhi Heritage Portal