बातचीत : नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवाले स्वयंसेवकोंसे ५१५ ध्यान दिलानेके बाद हमने उसे हटाये जानेका मौका देनेका धीरज नहीं दिखाया । इन कारणोंसे हम सत्याग्रहको स्थगित करते हैं । और तब उस संघर्ष में मेरी भूमिकाका प्रसंग आता है । में यह नहीं कह सकता कि इस संघर्षका नेतृत्व में नहीं करूँगा; और न में यही कहनेकी स्थिति में हूँ कि मैं उसका नेतृत्व अवश्य करूँगा । मेरा नेतृत्व करना, न करना इस बातपर निर्भर होगा कि उस समय मेरा मन क्या कहता है और इस बीच आपका आचरण कैसा रहता है। ऐसे मामलों में में भावावेशमें निर्णय लेता. नहीं, भावावेश सही शब्द नहीं है - मैं कहना चाहता हूँ, संबुद्धिके धरातलपर निर्णय लेता हूँ । उस स्थितिका वर्णन इसी पवित्र शब्द से किया जा सकता है । लेकिन, 'यंग इंडिया' से जितनी सहायता देते बन सकती है, उतनी सहायता आपको अवश्य मिलेगी । उसके स्तम्भोंके जरिये आपके पक्ष में जनमत तैयार करनेके लिए मुझसे जितना बनेगा, अवश्य करूँगा । एक प्रश्नके उत्तरमें महात्माजीने कहा : अंतिम निर्णय आपपर निर्भर होगा, मुझपर नहीं । मैं आपको उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं करना चाहूँगा । प्रारम्भ करनेवाले तो आप ही हैं। में तो आपको सिर्फ सलाह दे सकता हूँ, आपकी शक्तिको सही दिशा ही दे सकता हूँ। लेकिन अगर आप मेरी सलाह मानेंगे और मेरे नामका उपयोग करेंगे तो आप देखेंगे कि आप यह काम मेरी शर्तोंके मुताबिक कर रहे हैं। शर्तें मैंने आपको पहले ही बता दी हैं । आप चाहेंगे तो मैं उन्हें लिखकर भी दे दूंगा । यदि उन शर्तोंसे आप रंचमात्र भी विचलित हुए तो फिर उससे मेरा कोई सरोकार नहीं रह जायेगा। उद्देश्य अच्छा । लेकिन अगर इसके पीछे बुरे लोग होंगे तो इसको हानि पहुँचेगी । यह आन्दोलन एक प्रामाणिक आन्दोलन होना चाहिए। यदि ऐसा कुछ पाया गया कि आप कहते कुछ हैं और आपके मन में होता कुछ है तो में इस आन्दोलनकी भर्त्सना करनेसे भी बाज नहीं आऊँगा । इसके बाद महात्माजीने सत्यमूर्ति से पूछा : इस सम्बन्ध में आपका क्या विचार है ? क्या आप ऐसा समझते हैं कि कांग्रेस इस सवालको किसी भी रूप में अपने हाथमें ले सकती है या लेगी ? सत्यमूर्ति: कांग्रेस द्वारा इसे हाथमें ले लेने में मुझे तो कोई बाधा नहीं दिखाई देती। जहाँतक में मित्रोंसे जान सकता हूँ, आम भावना यह है कि आन्दोलनको समर्थन मिलना ही चाहिए। हम जो कर सकते हैं वह यह है कि हम निगम और विधान परिषद् में प्रस्ताव पेश करें; और मेरा खयाल है, हम यह करेंगे भी। इसके अलावा हम अखबारोंमें लिखकर और भाषण देकर इस मूर्ति के खिलाफ जनताको भावनाको उभाड़ेंगे, उसे समझायेंगे कि यह, महात्माजीके शब्दोंमें कहूँ तो, आतंकका प्रतीक है। इसके लिए नौजवानोंको अपने सिर किसी प्रकारको आर्थिक जिम्मेदारी लेनेकी जरूरत नहीं है। कांग्रेस पैसा जुटा लेगी। ठीक है न, श्री कुलन्दाई ? कुलन्दाई : हाँ, इस विषयमें यह भी एक दृष्टिकोण तो है ही । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५१
दिखावट