५१६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय सत्यमूर्ति: कांग्रेसकी भूमिकाकी हदतक भी आप ऐसा ही कहेंगे ? कुलन्दाई : दक्षिण भारतवालोंका स्वभाव कुछ ऐसा है कि यदि यह अवसर हाथसे निकल गया तो सब कुछ भापकी तरह उड़ जायेगा । मेरा अपना व्यक्तिगत विचार यही है और ऐसा में हृदयसे अनुभव करता हूँ । यदि बहुमत इस पक्षमें हो कि अभी इसे स्थगित कर दिया जाये और तीन महीने बाद फिर शुरू किया जाये और यदि कांग्रेस कमेटियाँ प्रचार कार्य उतनी ही चुस्तीसे करती हैं जितनी चुस्तीसे वे यह काम करती आई हैं... सत्यमूर्ति : यह तो जिला कांग्रेस कमेटीके मन्त्रीको हैसियतसे आपपर निर्भर करता है। कुलन्दाई : यदि आप मुझसे पूछते हैं तो मेरी सच्ची राय यह है कि जिस क्षण हम सत्याग्रह बन्द कर देंगे, उसी क्षण यह आन्दोलन सदाके लिए समाप्त हो जायेगा। तीन महीने का मतलब है, फिर कभी नहीं। इस प्रान्तमें अभी जो उत्साह जगा है, वह सच्चा उत्साह है और उसे खत्म नहीं होने देना चाहिए। महात्माजी, यहाँके लोगोंका स्वभाव उत्तर भारतवालों-जैसा नहीं है । मैं नहीं समझता कि इस मामले में उत्तर भारत दक्षिणसे किसी भी तरह बेहतर है । हम सब एक ही थैलीके चट्टे-बट्टे हैं । हममें कहीं कोई फर्क नहीं है । एक स्वयंसेवक : हमें भय तो सिर्फ उसका है, जो कुछ दो दिन पूर्व घटित हुआ। हममें से प्रत्येक शायद पूरा और सच्चा सत्याग्रही न हो। हम नहीं चाहते कि हममें कोई पस्ती आये। हम अपने-आपको ठीक ढंगसे संगठित करना चाहते हैं; और हम और भी आन्दोलन और प्रचार करके स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं। हम नहीं जानते कि हममें से कौन-से लोग सच्चे सत्याग्रही हैं । हमने आन्दोलन एकाएक ही आरम्भ कर दिया। आप तो जो कुछ कहते हैं, वह सत्याग्रह स्थगित करनेका एक अतिरिक्त कारण ही प्रस्तुत करता है । स्वयंसेवक : लेकिन साथ ही में यह भी नहीं चाहता कि सरकारको चैन लेने दिया जाये। मूर्तिको हटवानेके लिए आन्दोलनको दूसरे तरीकोंसे चलाते ही रहना चाहिए। हम तो सिर्फ युद्ध कौशलका खयाल करके पीछे हट रहे हैं, अपने हथियार नहीं डाल रहे हैं। इस स्थगनका मतलब यही है कि हम अवसर आनेपर फिर दूनी रफ्तारसे आगे बढ़ें। हम अपनी अक्षमता नहीं स्वीकार करना चाहते, क्योंकि उससे लोगोंमें पस्तो आयेगी । यह तो एक नई बात हुई । इस तरह तो आप वास्तव में मेरे नामकी आड़में अपनी असमर्थताको छिपाना चाह रहे हैं । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५२
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