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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५६१

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भाषण : पचयप्पा कॉलेज, मद्रासमें ५२५ आपके हृदयोंको प्रभावित करना चाहता हूँ । देश आपकी ओर आशासे देख रहा है; और मैंने जो बातें कही हैं वे आपके लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं । कालीकटके एक प्रोफेसर साहबने मुझसे अनुरोध किया है कि में सिगरेट, चाय और काफीके बारेमें भी कुछ कहूँ । इसलिए में अब इनको लेता हूँ । ये चीजें जीवन के लिए आवश्यक नहीं हैं । कुछ लोग दिन में काफीके दस-दस प्याले भी पी लेते हैं । क्या यह उनको स्वस्थ और जाग्रत रखने तथा अपने कर्त्तव्योंका पालनके लिए आवश्यक है ? यदि वे इसके बिना जाग्रत नहीं रह सकते तो अच्छा यही है कि सो जायें, लेकिन काफी या चाय न पियें। हमें इन चीजोंका गुलाम नहीं बनना चाहिए । लेकिन काफी और चाय पीनेवाले अधिकांश लोग इनके आदी बन जाते हैं। सिगार और सिगरेटें देशी हों या विदेशी, उनसे बचना ही चाहिए। सिगरेटका पीना तन्द्राकारी होता है और आप जो सिगार पीते हैं, उनमें तो अफीमका पुट भी रहता ही है । ये आपके शरीरके तंतुओंपर हावी हो जाते हैं, और फिर आप इनको छोड़ नहीं पाते । समझमें नहीं आता कि कोई भी विद्यार्थी अपने मुँहको एक चिमनी बना देना कैसे पसन्द कर सकता है। यदि आप चाय, काफी, सिगरेट और सिगार पीना छोड़ दें, तो खुद देखेंगे कि खर्च में कितनी बचत होती है। टॉल्स्टॉयकी एक कहानी है, जिसमें एक शराबी किसीकी हत्या करने जाता है, पर उसके मनमें हिचकिचाहट होती है । लेकिन जैसे ही वह सिगार पीता है, उसका धुआँ छोड़ने के साथ ही मुस्कराते हुए उठ खड़ा होता है और कहता है : " में भी कैसा बुजदिल हूँ ।" वह कटार निकालकर हत्या कर देता है । टॉल्स्टॉयने अपने अनुभव के आधारपर ही लिखा है । उनको जिस चीजका आत्मानुभव था, उसीको उन्होंने लिखा है । और वे सिगरेटों और सिगारोंके तो शराब से भी ज्यादा खिलाफ हैं । पर आप यह मत मान बैठिए कि शराब और तम्बाकूमें शराब कम नुकसानदेह है । बिलकुल नहीं। सिगरेट अगर इब्लीस है तो शराब शैतान है । यहाँ एक हिन्दी प्रचार कार्यालय है, जिसका खर्च उत्तर भारतके लोग उठाते हैं। संस्थाने लगभग एक लाख रुपये खर्च किये हैं और हिन्दी शिक्षकगण अपना काम नियमित रूप से करते रहे हैं। कुछ प्रगति हुई है, लेकिन हम अभीतक कोई ठोस काम नहीं कर पाये हैं। यदि आप रोजाना एक घंटा दें तो साल भर में हिन्दी सीख सकते हैं। आप छः महीने में सरल हिन्दी समझने लायक बन सकते हैं । आप में से अधिकांश हिन्दी नहीं जानते, इसलिए मैं आपके सामने हिन्दी में नहीं बोल सकता। भारत में हिन्दीको सर्वव्यापक भाषा बनाना चाहिए। आपको संस्कृत भी जाननी चाहिए, जिससे आप 'भगवद्गीता' पढ़ सकें। एक श्रेष्ठ हिन्दू संस्थाके विद्यार्थी होनेके नाते आपको 'भगवद्गीता' पढ़ाई जानी चाहिए। मैं चाहूँगा कि यहाँ मुसल- मान विद्यार्थी भी पढ़ने आ सकें। (एक आवाज आई - " पंचमोंको इसमें दाखिला नहीं दिया जाता । " ) यह तो मुझे एक नई बातका पता लगा । पंचमों और मुसलमानों, दोनोंके लिए इस संस्थाके द्वार खोल देने चाहिए। यदि यहाँ पंचमोंको दाखिला नहीं दिया जायेगा तो मैं इसे हिन्दू संस्था मानने से इनकार करता हूँ । (सुन्दर ! खूब ! ) हिन्दू संस्था होने का मतलब यह तो नहीं होता कि कोई पंचम या मुसलमान यहाँ Gandhi Heritage Portal