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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५६८

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५३२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय (संसारके जीवनोंको सुख पहुंचानेवालोंकी नीति) जननी जनक बन्धु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ॥ सब के ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँधि बरि डोरी ॥ समदरसो इच्छा कछु नाहीं । हरष, सोक, भय, नहि मन माहीं ॥ अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें ॥ तुम्ह सारिखे सन्त प्रिय मोरें । घरउँ देह नहि आन निहोरें ॥ दोहा सगुन उपासक परिहित, निरत नीति दृढ़ नेम । । ते नर प्रान समान मम जिन्ह के द्विज पद प्रेम ॥ जबतक सब नेता ऐसा न समझ लें तबतक यह संसारके पापी जीव तर नहीं सकेंगे। क्या करूँ इस समय (ममत्व) के अहंने सबकी मतियोंपर अपना दबाव डालकर अंध कर दिया है। जीव मायाके जालमें पड़ बौराय रहे हैं । इससे हे महात्मन्, ईश्वर आपको दीर्घायु प्रदान करे, जिससे कलियुग के पाप दूर हों । ( प्राथि नम्र चिन्ताजनक रामचन्द्र ) किसान अवध ४-११-२४-८१


बड़ो दादाकी बक्षिस इसी प्रकारकी बड़ो दादासे प्राप्त एक अमूल्य वस्तु मेरे पास हमेशा रहती है । उनके जीवनकालमें जब में शान्तिनिकेतन में आखिरी दफा गया था, उस समय नीचे दिया हुआ श्लोक उन्होंने मुझे अपने हाथसे लिखकर दिया था : विपत् संपदिवाभाति मृत्युश्चाप्यमृतायते । शून्यमा पूर्णतामेति भगवज्जन संगमात् । इसका अर्थ दूँ : भगवद्भक्त के सत्संगसे दुःख सुख रूप होता है, मृत्यु भी अमृत-रूप बन जाता है और जड़ मनुष्य सम्पूर्ण ज्ञानी बन जाते हैं । एक जंगली गिना जानेवाला किसान भी समय आनेपर तुलसीदासकी ज्ञान और भक्ति रसपूर्ण चौपाइयाँ लिख सकता है और दूसरा महाकवि अपनेको गूढ़ ज्ञान होने पर भी अहंभावको छोड़कर सत्संगकी खोज में रहता है। उपरोक्त दोनों अवतरणोंपर उसके साथ मेरा जो सम्बन्ध है उसे त्यागकर पाठक यदि तटस्थ दृष्टिसे विचार करेंगे तो उन्हें मालूम होगा कि हमारी सभ्यता क्या है और उसके लायक हम कैसे बन सकते हैं । हिन्दी नवजीवन, ८-९-१९२७ १. रवीन्द्रनाथ ठाकुरके अग्रज द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर । २. मई, १९२५ में; देखिए खण्ड २७ । Gandhi Heritage Portal