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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५८५

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भाषण : वाई० एम० सी० ए०, कडलूर में ५४९ बीच पाकर बड़ी खुशी हो रही है जो मेरी ही तरह पूर्ण बननेको प्रयत्नशील हैं । मुझे इस बात से बड़ी तसल्ली मिलती है कि उनमें से बहुत-से लोगोंके प्रयत्न सफल हुए हैं। और इसलिए यदि मेरे प्रयत्नके पीछे भी श्रद्धा और एकान्त निष्ठा है तो कोई कारण नहीं कि में भी उन्हींकी तरह सफल न होऊँ। और मुझे लगता है कि उस प्रयत्न के दौरान मैंने कुछ खास बातें जानी हैं। अब मैं उन बातोंके परिणामोंको, जिनसे भी मिलता हूँ, उन्हें अपनी सामर्थ्य-भर बतानेकी कोशिश कर रहा हूँ । इनमें से एक बात तो यह है कि व्यक्ति के विकास और समूह के विकासमें कोई अन्तर नहीं है, और इसलिए समूहका विकास पूरी तरहसे व्यक्तिके विकासपर निर्भर है। अतएव, अंग्रेजीकी यह उक्ति ठीक ही है कि किसी जंजीरकी मजबूतीका अन्दाजा उसकी सबसे कमजोर कड़ीको देखकर ही लगाया जा सकता है । और यदि हम इस उक्ति के सम्पूर्ण सत्यको हृदयंगम कर लें तो हम देखेंगे कि इस सभा में उपस्थित कोई भी नौजवान अपनेको शेष लोगोंसे अलग करनेकी आशा नहीं कर सकता और अपने- आपको उन सबसे ऊपर नहीं मान सकता। जब में अपने स्कूली जीवन के बारेमें सोचता हूँ तो मेरे सामने उन लड़कोंकी तसवीर साफ-साफ उमर आती है जो महज इस कारण कि वे कक्षामें होशियार समझे जाते थे, बड़े घमंडी थे । और उनमें कुछ लोग खेल-कूद में तेज होने और शारीरिक दृष्टिसे सबल होने के कारण दूसरोंपर धौंस जमाते थे। लेकिन, मुझे यह भी पता चल गया कि उनका अहंकार उन्हें विनाशकी ओर लिये जा रहा है, क्योंकि कमजोर लड़कोंने उनकी उद्धतताको देखते हुए अपने-आपको उनसे बिलकुल अलग कर लिया और उन्हें अस्पृश्य मानने लगे और इस तरह उन्होंने वास्तव में अपने ही हाथों अपनी कब्र खोदी। इसलिए, व्यक्ति के विकासकी सबसे पहली शर्त यह है कि उसमें अतीव विनम्रता हो । और अगर आज हम अपने ही देश में कुछ लोगोंको दम्भपूर्वक अपने-आपको श्रेष्ठ कहते और दूसरोंको अस्पृश्य और ऐसे व्यक्ति मानते देखते हैं जिनकी छायातक से छूत लगती है तो जो लोग इस झगड़े से अलग खड़े हैं वे देख रहे हैं कि ये लोग भी अहंकारवश अपने ही हाथों अपनी कब्र खोद रहे हैं। इस तरह आप देखेंगे कि व्यक्ति के विकास और समूहके विकास में पूरा सामंजस्य है और में उन सभी विद्यार्थियों, सभी युवकों और युव- तियोंसे, जो देशकी सेवा और बड़े-बड़े काम करना चाहते हैं, यही बात कहता हूँ : " सबसे पहले अपनी ओर ध्यान दो, अपनेको सँवारकर सेवाके लिए उपयुक्त साधन बनाओ।" मैं मानता हूँ कि जबतक किसी युवक या युवतीका अपना दामन पाक न हो अर्थात् उसका अपना हृदय शुद्ध न हो तबतक वह समाजकी सेवा नहीं कर सकती । लेकिन यह कहना आसान है कि हमारा हृदय शुद्ध है, पर अपने हृदयको शुद्ध बनाना बहुत कठिन है । इसीलिए ईसाई धर्मकी जीवन-योजनामें हम 'नया जन्म' नामकी चीज देखते हैं। हिन्दू धर्म में उसका पर्याय द्विज है । आज द्विज शब्दका जो अर्थ है, वह भाषाका दुरुपयोग है । ईसाइयोंमें भी नये जन्मके साथ कुछ ऐसा अर्थ जुड़ गया है जैसा अर्थ, जब यह शब्द पहले-पहल प्रयोगमें आया था, तब बिलकुल नहीं था । यह नया जन्म न किसी बाह्य परिस्थितिसे आता है और न मुंहसे कुछ स्वीकार कर Gandhi Heritage Portal