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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५८६

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५५० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय 37 लेनेसे आ जाता है। यह तो व्यक्तिके अन्दर होनेवाला एक परिवर्तन है, जो साफ लक्षित होता है । इस परिवर्तनको सम्बन्धित व्यक्ति भी लक्ष्य कर पाता है और उसके पड़ोसी भी । यह हृदयका परिवर्तन है और इसके लिए मुंहसे कुछ कहने की जरूरत नहीं होती । और ऐसा सम्पूर्ण परिवर्तन हार्दिक प्रार्थना और इस तथ्यके निश्चित और जीवन्त बोधसे ही आ सकता है कि हमारे भीतर कोई प्रबल शक्ति विद्यमान है । इसे हम भक्तियोग कहते हैं और अंग्रेजीमें इसका मतलब है भक्ति के द्वारा ईश्वरका सान्निध्य प्राप्त करना। और उस योगकी साधना किसी दस वर्षीय बालकके लिए भी सम्भव है और कब्र में पैर लटकाये वृद्धके लिए भी। जब सचमुच वह परिवर्तन आ जाता है तब फिर व्यक्ति के विपथगामी होनेका सवाल ही नहीं उठता। लेकिन, अक्सर होता ऐसा है कि लोग भ्रमवश ऐसा समझ लेते हैं कि मुझमें वैसा परिवर्तन हो गया है, यद्यपि वास्तव में होता नहीं । इसलिए, अपने मनको समझानेके लिए हमने एक नया शब्द 'प्रत्यावर्तन' (बैकस्लाइडिंग) गढ़ लिया है। सच तो यह है कि यह तथाकथित परिवर्तन वास्तवमें परिवर्तन था ही नहीं, वह तो केवल एक भ्रम था । और इस बात को समझकर जहाँ प्रौढ़ स्त्री-पुरुष बराबर प्रयत्नशील और विनम्र रहते हैं, वहाँ जो लड़के-लड़कियाँ यह कहने लगते हैं कि हम तो अब बिलकुल बदल गये, वे आत्मवंचनाके शिकार होते हैं । इसलिए जब कभी हम अपने अन्दर ऐसी कोई ऊर्ध्वमुखी प्रवृत्ति या कुछ अच्छा करनेकी वृत्ति लक्षित करें तो हमें आशा- न्वित तो होना चाहिए, किन्तु अपना प्रयत्न बन्द नहीं करना चाहिए। " मैंने अपने भीतरके शैतानको निकाल बाहर कर दिया है, अब में कभी गिर ही नहीं सकता अहंकारपूर्वक मन में ऐसा सोचने के बजाय हमें अपने-आपसे कहना चाहिए, "कौन जाने, वास्तविकता क्या है ? मुझे बराबर सावधान रहना चाहिए। " ईश्वरने मनुष्यको एक वचन दे रखा है, जो कभी टूट नहीं सकता। वह यह कि अपनी आत्माके उत्थान के लिए किया गया कोई भी प्रयत्न कभी भी पर्याप्त रूपसे पुरस्कृत हुए बिना नहीं रह सकता। लेकिन, मैं जानता हूँ और यह सोचकर मुझे बड़ा दुःख होता है कि मैं अपने सामने उपस्थित युवकोंसे यह सब कह तो रहा हूँ, लेकिन अपना मन्तव्य उन्हें समझा नहीं पा रहा हूँ । मुझे ऐसा लगता है कि में विद्यार्थियोंसे एक विदेशी भाषामें अपनी बात कह रहा हूँ । मेरा मतलब यह नहीं है कि मैं अंग्रेजीमें बोल रहा हूँ, बल्कि यह है कि एक ऐसे शब्द के बारेमें बोल रहा हूँ जो आप लोगोंके लिए बिलकुल नया है, विदेशी है। ईश्वर शब्दका कोई जीवन्त प्रभाव, कोई जीवन्त अर्थ ही नहीं रह गया है। मुझे याद है, अभी कुछ ही महीने पहले एक नौजवानसे मेरी बातचीत हुई थी। वह काफी कुशाग्रबुद्धि और किसी हदतक पढ़ा-लिखा भी था। बातचीत के दौरान उसने कहा था कि " आप ईश्वरके बारेमें इतना बोलते हैं, इतना अधिक लिखते हैं, लेकिन में आपको साफ बता दूं कि आप जो कुछ कहते हैं, मेरे हृदय में उसकी कोई प्रतिध्वनि नहीं होती।" मेरे एक अंग्रेज मित्र हैं, जिनका सम्बन्ध इंग्लैंडके अंग्रेजीके एक श्रेष्ठ दैनिकसे है। उन्होंने भी हालमें ही मुझे एक पत्र लिखा । उसमें उन्होंने अस्पृश्यता, मद्य-निषेध और सामाजिक सुधारसे सम्बन्धित मेरे कार्योंको बड़ी Gandhi Heritage Heritage Portal