भाषण : कडलूरकी सार्वजनिक सभामें ५५५ पैरों तले रौंदनेका प्रयत्न कर रहे हैं, जिसे आपने सदियोंकी विरासतके रूपमें पाया है । केवल कलम हिलाकर या सम्भव है, तलवारके बलपर आप हिन्दू धर्मको उसकी बुनियाद से उखाड़ने के लिए आतुर हो गये हैं । हिन्दू धर्मके बाह्यावरण, उसके छिलके और छूछसे असन्तुष्ट होकर यह असन्तुष्ट होना ठीक ही है - अब आप सार अर्थात् स्वयं जीवनसे भी हाथ धो बैठनेकी जोखिममें हैं। आप अधीरतावश ऐसा सोचते प्रतीत होते हैं कि वर्णाश्रमके पक्षमें कहने को कुछ है ही नहीं । आपमें से कुछ लोग यह भी सोचनेके लिए तैयार हैं कि मेरा वर्णाश्रमका बचाव करनेका कारण मेरा स्वयं एक भ्रमका शिकार होना है । आप ऐसा सोचनेकी गलती न करें। जो लोग ऐसा कहते हैं उन्होंने यह समझनेकी तकलीफ भी नहीं की है कि वर्णाश्रमसे मेरा क्या अभिप्राय है । यह एक सार्वभौम नियम है, जिसे हिन्दू धर्म में विस्तारपूर्वक बताया गया है । यह आध्यात्मिक अर्थशास्त्रका एक नियम है। पश्चिमके राष्ट्रोंको और स्वयं इस्लामको अनजाने ही इस नियमका पालन करना पड़ता है। इसका श्रेष्ठता या हीनतासे कोई सरोकार नहीं है। खान-पान या विवाहकी प्रथाएँ वैष्णव धर्मका कोई अभिन्न अंग नहीं हैं। ये नियम आपके और हमारे पूर्वज ऋषियोंने खोजे थे । उन्होंने देखा कि यदि उन्हें अपने जीवनका सर्वोत्तम भाग अपने निमित्त नहीं, बल्कि ईश्वर और संसारके निमित्त अर्पित करना है तो उन्हें आनुवंशिकताका नियम स्वीकार करना होगा । इस नियमका उद्देश्य है मनुष्यकी शक्तियोंको जीवन में अधिक ऊँचे लक्ष्योंकी प्राप्तिके लिए मुक्त करना । इसलिए सच्चे अब्राह्मणोंको उस नींवको ही कमजोर करनेकी कोशिश नहीं करनी चाहिए जिसपर वे बैठे हुए हैं, बल्कि उनका प्रयत्न उस नींव- पर जमी हुई धूलको साफ करना और उसे बिलकुल स्वच्छ करना होना चाहिए। आप निश्चय ही अस्पृश्यताके उस दैत्यसे अपनी पूरी शक्ति के साथ लड़िए जिसे गलतीसे आज वर्णाश्रमके नामसे जाना जाता है; उसमें आप मुझे अपने साथ कन्धा मिलाकर काम करता पायेंगे। मेरा वर्णाश्रम ऐसा है कि में हर ऐसे व्यक्ति के साथ खा सकता हूँ जो मुझे स्वच्छ भोजन दे, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई हो या पारसी अथवा अन्य कुछ। मेरे वर्णाश्रम धर्म में इस बात की पूरी गुंजाइश है कि कोई परिया लड़की मेरे घर में मेरी बेटीकी तरह रहे । मेरे वर्णाश्रम में कई पंचम परिवार शामिल हैं जिनके साथ मैं बहुत ही आनन्दपूर्वक भोजन करता हूँ और जिनके साथ भोजन करना सौभाग्यकी बात मानता हूँ। मेरा वर्णाश्रम संसारके बड़े से बड़े शक्ति-सम्पन्न राजाके सामने सिर झुकाने से इनकार करता है, लेकिन मेरा वर्णाश्रम मुझे ज्ञानके सामने, शुद्धता के सामने, किसी भी ऐसे व्यक्ति के सामने, जिसमें में ईश्वर के दर्शन करता अपना सिर झुकानेको मजबूर करता है । इसलिए आप ऐसे शब्दोंकी दुहाई मत दीजिए जो आज सर्वथा अर्थहीन और अव्यवहार्य हो गये हैं । ब्राह्मणको आप जितना भी भला-बुरा कहना चाहें, कहें, लेकिन ब्राह्मण धर्मके विरुद्ध न कहें। और भले ही आप मुझे गलत समझें या मुझे ब्राह्मण समर्थक ही क्यों न समझें, में आपके सामने यह कहनेका साहस करता हूँ कि हालाँकि ब्राह्मणोंको अपने अनेक पापोंका प्रायश्चित्त - Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५९१
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