विद्यार्थियोंकी कसौटी ५५७ सहायता या आत्मशुद्धिकी बात नहीं सोचते; बस एक दूसरेपर कीचड़ उछालते रहते हैं। चूँकि परस्पर एक-दूसरे पर कीचड़ उछालनेके इस काम में भाग लेनेकी मेरी कोई इच्छा नहीं है, इसलिए मैं तो बस उन छोटी-छोटी चीजोंको सामने लेकर आता हूँ जिनके बारेमें मैंने आपसे कहा है । आप भले कुछ भी करें या न करें, में आपसे इन चीजोंको न भूलनेका अनुरोध करूँगा । में एक बार फिर आपके अभिनन्दनपत्रों तथा थैलियोंके लिए, तथा उससे भी ज्यादा, मेरी बातें कृपापूर्वक सुननेके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ। यह सन्देश जिस भावनाके साथ आपको दिया गया है उस भावनाको समझने में ईश्वर आपकी सहायता करे। [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २२-९-१९२७ ४३३. विद्यार्थियोंकी कसौटी यह जानकर मेरी छाती फूल उठती है कि विद्यार्थीगण संकट निवारणके काम में शरीर-श्रम करके अच्छी तरह हाथ बँटा रहे हैं। उज्ज्वल भविष्य के निर्माणकी आशा उन्होंपर निर्भर है। यदि यह नींव कच्ची रह जाये तो इमारत एक आडम्बर है । मैं आशा करता हूँ कि कोई भी विद्यार्थी अथवा विद्यार्थिनी ऐसा नहीं मानती होगी कि हम पढ़ना छोड़कर कहाँसे इस संकट में पड़ गये। यदि उनके मनमें ऐसी कोई चिन्ता होती हो तो उनकी यह सेवा संकोच और अनिच्छासे की हुई सेवा मानी जायेगी और उस हदतक कच्ची कहलायेगी । ऐसी सेवा ही सच्ची शिक्षा है । यह सेवा करते हुए विद्यार्थियोंको जो अनुभव मिल रहा है, वह किसी शाला अथवा महाविद्यालय में नहीं मिल सकता। विद्यार्थी सिपाही है। सिपाहीकी सिपाहगिरी शुद्ध मनसे आज्ञापर अमल करनेमें है । इसी प्रकार विद्यार्थीकी विद्या शुद्ध हृदयसे गुरुकी आज्ञा-पालन करनेमें है, फिर गुरुकी आज्ञामें दोष भले ही हो। उस दोषकी सजा विद्यार्थी नहीं भोगता । उसने शुद्ध मनसे आज्ञा- पालन किया, इसलिए वह अलिप्त रहेगा और फिर भी हृदयसे आज्ञा-पालन करनेका अप्रत्याशित फल तो उसे मिलेगा ही । फलेच्छा-रहित होकर काम करनेका अर्थ यह नहीं है कि कर्म निष्फल जाता है । कर्मका फल तो मिलेगा ही । गुरुकी आज्ञाके पालन में विद्यार्थीका कर्म हुआ - आज्ञाका फलेच्छा-रहित पालन । उसका शुभ परिणाम विद्यार्थीकी आत्मोन्नतिके रूपमें प्रगट होता है । पालनकी प्रक्रियाका प्रेरक तो गुरु है, इसलिए यदि गुरुकी आज्ञा दोषयुक्त हो, तो उसका फल गुरुको भोगना पड़ेगा । हम यहाँ इस बातपर विचार नहीं करेंगे कि गुरुको अपने दोषका फल कब भोगना पड़ेगा अथवा कैसे भोगना पड़ेगा । यहाँ तो मेरा हेतु केवल विद्यार्थियों द्वारा की गई सेवाके प्रति अपनी प्रसन्नता प्रकट करना और उन्हें प्रोत्साहन देना था । उसी प्रसंग में मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार विद्यार्थियों के धर्मका भी थोड़ा विचार कर लिया । [ गुजरातीसे ] नवजीवन, ११-९-१९२७ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५९३
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