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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५९९

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भाषण : चिदम्बरम्की सार्वजनिक सभामें ५६३ इसलिए जब में नन्दनारके बारेमें, उनके उदात्त सत्याग्रहके बारेमें और उनकी सफलताके बारेमें कोई कहानी सुनता या पढ़ता हूँ तो मेरा सर उनकी आत्मशक्तिके सामने झुक जाता है । जिस स्थानकी मिट्टी नन्दनारके चरणोंसे पावन हुई है, उस स्थानपर आ सकनेके कारण आज सारा दिन में बड़े गौरवका अनुभव करता रहा हूँ । जब कुछ ही मिनटके अन्दर मुझे इस स्थानको छोड़ना होगा तो मेरे दिलको तकलीफ होगी । लेकिन मुझे इस बात से बहुत खुशी हुई और मैंने इसे बहुत बड़ा सम्मान माना कि मुझसे जो सबसे पहला काम करनेको कहा गया वह था उस मन्दिरके मुख्य द्वारका शिलान्यास करना जिसे उस महान् सन्तकी स्मृति में निर्मित किया गया है । मेरी कितनी इच्छा है कि चिदम्बरम्की जनताके बारेमें यह कहा जा सकता कि कमसे कम उसकी नजर में ब्राह्मणों और पंचमोंमें कोई भेद नहीं है । यदि चिदम्बरम्के लोग उस ऊँचाईतक उठ जायें तो वे केवल वही करेंगे जिसकी अपेक्षा 'गीता' हर हिन्दूसे करती है । ईश्वरकी निगाहमें कोई स्पृश्य या अस्पृश्य नहीं है । ब्राह्मणोंको उनकी श्रेष्ठताके कारण, या अन्य लोगोंपर अधिकार जतानेकी सामर्थ्य के कारण ब्राह्मण नहीं कहा जाता, बल्कि अपने ज्ञानसे मानव मात्रकी सेवा करनेकी उनकी क्षमताके कारण, और सेवा करते हुए आत्म-साक्षात्कार करनेकी उनकी क्षमताके कारण उन्हें ब्राह्मण कहा जाता है । अपने सह-बन्धुओंकी सेवा करनेका सौभाग्य और कर्त्तव्य उनका है। जबतक वे सभी भौतिक पुरस्कारोंका त्याग न कर दें तबतक वे पूर्ण रूपसे यह सेवा नहीं कर सकते। लेकिन अपनी दुर्दमनीय आत्मशक्ति और ईश्वरकी असीम उपस्थिति में अपने प्रबल विश्वासके कारण नन्दनार ब्राह्मणोंके दर्पको खंडित कर सके और उन्होंने यह दिखा दिया कि वे भावनामें अपने उन सतानेवालोंसे कहीं अधिक श्रेष्ठ थे जो उन्हें मानव मात्रका अभिशाप मानते थे। लेकिन पंचमोंके, आदि द्रविड़ भाई बहनोंको चाहिए कि नन्दनारके उदाहरणका लाभ उठाते हुए, उन्होंने जो भावना विरासत में पाई है, उस भावनाके अनुरूप व्यवहार करें । नन्दनारने किसी प्रकारका आडम्बर रचकर नहीं, बल्कि शुद्धतम आत्मत्यागके बलपर हर बन्धनको तोड़ कर अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त की; उन्होंने कभी अपने प्रपीड़कोंको गाली नहीं दी। उन्होंने अपने प्रपीड़कोंसे अपने उचित अधिकार भी नहीं माँगे । लेकिन उन्होंने अपनी उदात्त प्रार्थनाओं और अपने चरित्रकी शुद्धतासे उन प्रपीड़कोंको लज्जित कर दिया और वे उसके साथ न्याय करनेको विवश हो गये; अगर मैं मनुष्यकी भाषा में कहूँ तो उन्होंने स्वयं ईश्वरको नीचे उतरने और उन प्रपीड़कोंकी आँखें खोलनेको विवश कर दिया। जो कुछ नन्दनारने अपने समय में किया, हम सब भी आज वही कर सकते हैं। मैं चाहता हूँ कि आप श्रोतागण नन्दनारको भावनाको थोड़ा-बहुत ग्रहण करें, और यदि हममें से इतने सारे लोग नन्दनारका अनुकरण कर सकें तथा उनकी भावनाको आत्मसात् कर सकें तो हम इस देशको पुनः धर्मात्मा लोगोंकी पुण्य भूमि बना सकते हैं। मैं आशा करता हूँ और भगवान् से मेरी प्रार्थना है कि जिस मन्दिरके साथ आज न्यासियोंने मुझे सम्बन्धित कर दिया है उस मन्दिरका वातावरण हमेशा पवित्र रखकर आप इस महान् सन्तकी यादको हमेशा ताजा रखेंगे। मैं चाहूँगा कि इस Gandhi Heritage Portal