पत्र : मीराबहनको ५६५ निश्चय ही यह राष्ट्र-प्रेमका ककहरा है । इन करोड़ों भूखे लोगोंके प्रति प्रेमवश आप खादी पहनें, यह तो इस प्रेमका ककहरा है । मुझे उतना ही दुःख उस समय हुआ जब मेरे यहाँ आते ही स्वामी सहजानन्दने मुझे बताया कि उनके बालक-बालिकाएँ खादी इसलिए नहीं पहने हुए हैं क्योंकि जो इनका खर्च चलाते हैं वे लोग खादीके समर्थक नहीं हैं। खद्दरकी जो भावना मैंने आपको अभी बताई है, यह बात उसके बिलकुल विपरीत है। इन तथ्योंको देखते हुए आप मुझे यह कहने के लिए क्षमा करेंगे कि आपकी उन थैलियोंका सच्चा या आन्तरिक मूल्य भी कुछ नहीं है। अब में शराबकी लत के बारेमें कुछ कहूँगा । जिन्हें शराबकी लत है, आपको उन लोगोंसे यह लत छोड़नेको कहना चाहिए । और जिन लोगोंको इसकी लत नहीं है, यदि उन्हें अपने कम भाग्यशाली भाइयों से कोई सच्चा प्रेम है तो उन्हें तबतक सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए जबतक वे लोग इस अभिशाप से मुक्त नहीं हो जाते और इस देशमें नशाबन्दी लागू नहीं हो जाती । इसी प्रकार आपको इस कलंकपूर्ण अनैतिक देवदासी प्रथाको भी समाप्त कर देना चाहिए। आप बाल-विवाह न करें; तब घरोंमें बाल-विधवाएँ रहेंगी ही नहीं । अब समय आ गया है जब हमें क्षण-भर भी विलम्ब किये बिना अपने समाज में ये बुनियादी सुधार करने चाहिए। मैं एक बार फिरसे इन अभिनन्दनपत्रों तथा थैलियोंके लिए और धीरजके साथ मेरी बात सुननेके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ । [ अंग्रेजी से ] हिन्दू, १३-९-१९२७ दुबारा नहीं पढ़ा चि० मीरा, ४३८. पत्र : मीराबहनको १२ सितम्बर, १९२७ कल तुम्हें बधाईका तार दिये बिना मुझसे नहीं रहा गया। ये दिन जरा चिन्ताके ही रहे । यद्यपि मैंने तुम्हें बहुत नहीं लिखा और तार भी नहीं दिया, फिर भी मेरा मन तुम्हारी तरफ ही लगा रहा, तुम्हारी ही चौकसी करता रहा। मैं जानता था कि मैं तुम्हें रोज एक तार भेजूँ तो तुम्हें अच्छा लगेगा। लेकिन मैंने सोचा कि मुझे नहीं भेजना चाहिए। इन दिनों कामकी इतनी भीड़ रही है कि पत्र लिखना लगभग असम्भव ही हो गया। लोग मेरे पास बस इतना ही समय छोड़ते हैं कि मेरे सामने जो कार्यक्रम है, उसे निपटा सकूं। विविध श्रोता-मण्डलियोंके आगे मैं अपनी आत्मा उँडेल रहा हूँ । इसके बाद और किसी कामके लिए मेरे पास बहुत कम शक्ति बच रहती है । ऊपरसे कुमारी मेयोकी पुस्तक पढ़ने और उसपर लम्बा-चौड़ा लेख लिखनेकी जिम्मेदारी आ पड़ी है। १. देखिए " नाली-निरीक्षककी रिपोर्ट ", १५-९-१९२७ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६०१
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