चि० गंगाबहन ( वैद्य), ४३९. पत्र : गंगाबहन वैद्यको मौनवार [१२ सितम्बर, १९२७ से पूर्व ] तुम्हारा पत्र मिल गया है । तुम्हारे संस्कृतके अक्षर तो बहुत सुन्दर कहे जा सकते हैं। गुजरातीकी लिखावट भी सुधरी है । में यह नहीं चाहता कि अधिक अक्षरज्ञान प्राप्त करनेमें तुम ज्यादा समय लगाओ, किन्तु यदि तुम्हारी यही इच्छा हो तो कोई बुरी बात नहीं है, ऐसा सोचकर मैं तुम्हारी इस इच्छा में सहायता करूँगा । जबतक दूसरी पढ़ी-लिखी बहनोंको देखकर तुम्हें अपने ज्ञानमें न्यूनता महसूस होती हो और उनके जितना ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छा होती हो तबतक मर्यादाके भीतर उतना ज्ञान अवश्य प्राप्त करो और वैसा करनेका तुम्हें अधिकार है । परन्तु यदि तुम्हारी आत्मा अबतक बिलकुल शान्त हो गई हो और तुम्हें ठीक लगे तो एक ही कामको हाथमें लो, मैं यही चाहता हूँ । परन्तु यह तो हृदयकी बात है। जबतक हृदय कुबूल न करे तबतक तो प्रयत्न करना ही चाहिए । फिलहाल तो संकट निवारण कार्य तुम्हारा समय ले लेगा, मैं यह देख रहा हूँ । गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८८२२) से । सौजन्य : गंगाबहन वैद्य भाई जेठालालजी, ४४०. पत्र : जेठालाल जोशीको बापूके आशीर्वाद भाद्रपद कृष्ण १ [ १२ सितम्बर, १९२७] आपका पत्र मीला है। मेरी सलाह है कि आप आश्रमके मंत्रीसे भेंट करें और कुछ काम वहाँ मीले तो लीजीये। मेरा आश्रम में आना इस वर्ष में होनेका संभव कम है । आपका, मोहनदास जी० एन० १३५४ की फोटो नकलसे । १. गंगावहनके संकट निवारण कार्य में व्यस्त होनेके उल्लेखसे, देखिए “पत्र : आश्रमकी बहनोंको ", १२-९-१९२७ । २. वर्षका निर्णय गांधीजीको आश्रम जानेकी अक्षमताके उल्लेख और जेठालाल जोशी क्या काम करें, इसकी चर्चाके आधारपर किया गया है। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६०३
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