सुज्ञ भाईश्री, ४४१. पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको सोमवार, भाद्रपद वदी १ [१२ सितम्बर, १९२७] जीवनके बारेमें आपका पत्र मुझे मिल गया था। में चुप रहा हूँ सो आपपर उपकार करनेके लिए नहीं परन्तु अपनी खातिर । आपकी बात में समझ गया हूँ । जहाँतक मुझसे बन सके मैं कोई भूल नहीं करना चाहता । अपने-आपको शाबाशी नहीं देना चाहता, इसलिए मौन धारण करना ठीक माना । किन्तु इतना तो कहूँ न कि मेरे इस निश्चयका कारण तो आप ही थे। लेकिन यह तो बेकारकी बात हुई । पत्र तो मैं यह कहनेके लिए लिख रहा हूँ कि आप अपनी तबीयतका ध्यान रखना। कारण, आपसे मुझे बहुत आशाएँ हैं । मैसूरके बारेमें मेरा अन्तिम भाषण आपने न पढ़ा हो तो भेज दूं -- इस मतलबसे कि उसमें से जितना आप कर सकते हों उतना तो कार्यान्वित करें ही । मेरी गाड़ी चल रही है । यह पत्र मायावरम्से लिख रहा हूँ। मुसाफिरीकी तारीखें नहीं भेज रहा हूँ । आश्रमके पतेपर ही लिख दो तो भी ठीक रहेगा । चरखा चल रहा है न ? लेडी पट्टणीको पाणकोरा (गजी) पहनना किस हदतक सधा है ? गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२१४) की फोटो नकलसे । सौजन्य : महेश पट्टणी प्रिय बहनो, मोहनदासके वन्देमातरम् ४४२. पत्र : आश्रमकी बहनोंको मौनवार, भाद्रपद बदी १ [ १२ सितम्बर, १९२७] यह तो नहीं कहूँगा कि तुम्हारा पत्र मिला; हाँ, पुरजा मिला है। काशी- बह्नके राजकोट जानेपर तुमने गंगास्वरूप गंगाबहन झवेरीको प्रमुख नियुक्त किया है, यह मालूम हुआ। तुम इस तरह अपने लिए एक-के-बाद-एक सभानेत्री नियुक्त कर पाती हो, इससे तुम्हारी तन्त्र चलानेकी शक्तिका थोड़ा-सा प्रमाण मिल जाता है । जब तुम सभानेत्रीका हृदयसे सम्मान करोगी और अपना तन्त्र एकमत होकर चलाओगी तो वह और भी बड़ा प्रमाण माना जायेगा । पुरुषोंमें अभी ऐसा उज्ज्वल १. मायावरम् के उल्लेखसे वर्ष निर्धारित किया गया है । २. गंगाबहन झवेरीके अध्यक्ष नियुक्त किये जानेके उल्लेखसे । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६०४
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