५७४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय हैं कि बिना एक-दूसरेकी सहायता किये हर वर्ग, हर समुदाय, हर समूह, हर जातिको अपनी-अपनी दिशामें चलनेकी कोशिश करनी चाहिए। इसलिए हम आन्तरिक फूटसे ग्रस्त है। लेकिन ये झगड़े अस्थायी हैं और इनका समाप्त होना सुनिश्चित है । और जब बादल सचमुच छटेंगे और दिन निकलेगा तो उसके बाद आनेवाले हर्षोल्लास में दलित' वर्गीका शामिल होना भी सुनिश्चित है । और उस सूर्योदयकी बेलामें हर्षो- ल्लास में भाग लेने के लिए दलित वर्गीका यह बात समझ लेनी चाहिए कि अन्ततः हर एकको आत्म-सहायतापर निर्भर करना होगा। उनकी संख्या और उनका धन्धा उन्हें जो शक्ति प्रदान करते हैं, उन्हें उसकी प्रतीति-भर होनेकी जरूरत है; फिर तो वे एक दुर्दमनीय शक्ति बन जायेंगे। जैसे ही वे यह महसूस कर लेंगे कि वे किसीके दास नहीं हैं, और आखिरकार उनकी मेहनतके बिना वह जमीन जिसे वे जोतते-बोते हैं, भयानक और वीरान हो जायेगी, उसी क्षण उनकी विजय सुनिश्चित है । लेकिन मैं भू-स्वामी वर्गसे कहूँगा कि यदि अभिनन्दनपत्रमें उनके विरुद्ध लगाये गये आरोप सही हैं तो यह उनके लिए बड़ी लज्जाकी बात है । जिन कन्धोंपर चढ़- कर वे चल रहे हैं उन्हें वे अपने पैरोंके नीचे न कुचलें । उन्हें इन श्रमिक वर्गोंका विचार करना चाहिए; जिनकी मेहनत से ही बंजर जमीन हरी-भरी फसलसे लदकर मुस्काती प्रतीत होती है । भू-स्वामीवर्ग इन मजदूरोंको अपने ही परिवारका सदस्य समझे और उन्हें भी उस सुख तथा हर्षमें हिस्सा प्राप्त करने दे जिसे पैदा करनेमें इन मजदूरोंका इतना अधिक योगदान होता है । अपने ही मजदूरोंके प्रति 'अस्पृश्य' भावना गलत है, पापपूर्ण है । आइए हम इस कलंकको मिटा दें । लेकिन मुझे अभी [ आपसे ] एक और कलंककी बात भी करनी है। मैंने आज तीसरे पहर कुछ ऐसे सज्जनोंसे, जिनके बीचसे देवदासियाँ ली जाती हैं, बात की। मैंने इनमें से कुछ बहनोंसे भी भेंट की और उनके साथ गम्भीर चर्चा की। जब मैंने उनसे बात करते हुए इस प्रथाके छिपे हुए अर्थको समझा तो मेरी आत्मा इस सम्पूर्ण प्रथा के विरुद्ध विद्रोह कर उठी । इन्हें देवदासी कहकर हम धर्मके पवित्र नामकी आड़ में स्वयं ईश्वरका अपमान करते हैं । हम दोहरा अपराध करते हैं क्योंकि हम इन बहनोंका उपयोग अपनी कामवासनाकी तुष्टिके लिए करते हैं और उसी साँसमें, जो निहायत गन्दी होती है, हम ईश्वरका भी नाम लेते हैं । यह सोचकर जीवन से निराशा होने लगती है कि देशमें इस प्रकारकी अनैतिक सेवा करनेवालोंका एक वर्ग है और एक वर्ग ऐसा भी है जो इस प्रथाको चिरस्थायी बनाता है । और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मुझसे बात करते समय उनकी आँखों में कोई शैतानियत नहीं थीं, उनमें भी सूक्ष्म कल्पना और शुद्ध भावनाकी वैसी ही क्षमता थी जैसी कि संसारकी किसी भी औरत में होती है । हमारी अपनी सगी बहनों और उनके बीच क्या अन्तर हो सकता है ? और यदि हम ऐसे अनैतिक कामके लिए अपनी सगी बहनोंका उपयोग नहीं होने दे सकते तो हम ऐसे कामोंके लिए इन औरतों का उपयोग करनेका साहस कैसे करते हैं ? जो हिन्दू किसी भी रूप में इस बुराई से सम्बन्धित हैं, उन्हें चाहिए कि वे अपने को इससे मुक्त कर लें । हमारे Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६१०
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