भाषण : कुम्भकोणम् में ५८१ अभी मैंने कहा कि कुम्भकोणम् अपनी विद्वत्ताके लिए प्रसिद्ध है। इससे मुझे एक और बात याद हो आई, जिसके बारेमें कुछ कहना चाहूँगा । दुर्भाग्यवश आज हमारी विद्वत्ता - मेरा मतलब संस्कृतकी विद्वत्तासे है - अन्धविश्वासका पर्याय बनकर रह गई है। मैंने पचयप्पा हॉलमें विद्यार्थियों के सामने सर्वथा शुद्ध और निष्कपट भावसे कुछ बातें कही थीं। मुझे मालूम हुआ है कि यहाँके कुछ पण्डितोंको वे बातें बुरी लगी हैं। उन्होंने पत्र लिखकर मुझसे मिलनेका समय मांगा है। मैंने उन्हें अपना सन्देश भेज दिया है। पता नहीं, वह उनतक पहुँचा या नहीं। वह सन्देश यह है कि यद्यपि मेरे पास मुलाकात के लिए समय नहीं है, फिर भी आज रात ८ बजे उनसे मिलकर मैं प्रसन्न होऊँगा । लेकिन, में पूरे आग्रह के साथ निवेदन करना चाहूँगा कि मैंने विद्यार्थियों के समक्ष जो कुछ कहा वह पूरी तरह सोच-विचारकर कहा था और मुझे उसके एक भी शब्दको बदलनेका कोई कारण नहीं दिखाई देता । मैं अपनेको सनातनी हिन्दू मानता हूँ, और एक सनातनी हिन्दू के नाते में पूरी तरह सोच-समझ- कर यह कह रहा हूँ कि आज हम जिस रूप में अस्पृश्यता बरतते हैं उसके लिए हिन्दू धर्म में कोई आधार नहीं है और वह हिन्दू-समाजके लिए एक घोर कलंकका विषय है । में पूरी विनम्रतापूर्वक किन्तु उतना ही जोर देकर कहता हूँ कि यदि हम हिन्दू लोग अपने सिरसे इस कलंकको नहीं मिटायेंगे तो इस बातका गम्भीर खतरा है कि खुद हिन्दू धर्म ही मिट जायेगा । जिस धर्मके दो महान् सिद्धान्त " सत्यान्नास्ति परो धर्मः " और " अहिंसा परमो धर्मः " हैं, जो धर्म तात्त्विक सत्य और तात्त्विक प्रेम- पर आधारित है, वह केवल इस कारण से किसीको अस्पृश्य माननेकी स्वीकृति नहीं दे सकता कि उसका जन्म अमुक परिवेश या परिवार में हुआ है । और में अधिकसे- अधिक जोर देकर यह भी कहता हूँ कि मैंने अभी आपके सामने जिस हिन्दू धर्मकी परिभाषा बताई उसमें बाल-वैधव्य के लिए भी कोई आधार नहीं है। सभी मानते हैं कि विवाह व्यक्तिको एक विशेष दर्जा देता है, उसके जीवन में एक परिवर्तन लाता । जो बालिका अपनी माता या पिताकी गोद में बैठने के अलावा और किसी लायक है ही नहीं, उसके लिए पवित्र विवाह बन्धन जैसी कोई चीज नहीं हो सकती, और यदि पितृ-सुलभ वात्सल्यसे किसी पिताका मन तनिक भी नहीं पसीजता और वह अपनी कच्ची उम्रकी कन्याका विवाह कर देता है तो वह विवाह, विवाह है ही नहीं । वह तो माटीकी किसी मूर्तिको किसी पुरुषसे ब्याह देना है। इसीलिए में कहता हूँ कि चूंकि बाल-विवाह जैसी कोई चीज नहीं है, इसलिए बाल वैधव्य जैसी भी कोई चीज नहीं होती ।" इसलिए में इस सलाहको बेहिचक दोहरा रहा हूँ कि यदि कुछ विद्यार्थी विवाह करना चाहते हों तो उन्हें चाहिए कि वे ढूंढकर ऐसी वयस्क लड़कियोंसे विवाह करें जो बचपन में ही विधवा हो गई हों। यह एक परमार्थका कार्य होगा। और यदि वे कच्ची उम्र की लड़कियोंसे शादी न करके बाल-वैधव्यको समाप्त कर देनेका संकल्प कर लें तो यह देशकी बहुत बड़ी सेवा होगी। जब कोई चीज स्पष्टतः अनैतिक हो १. इससे आगेका अंश १६-९-१९२७ के हिन्दूसे लिया गया है। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६१७
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