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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६२०

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५८४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय नहीं हो सकती जो सत्य और प्रेमके विरुद्ध है। उन्होंने उनसे अनुरोध किया कि वे कुरीतियोंके विनाशकारी प्रभाव से हिन्दू धर्मको बचाने का जो काम कर रहे हैं उसमें वे उनके साथ सहयोग करें और सुधार के मार्ग में रोड़े अटकाकर हिन्दू धर्मके विनाशमें सहायक न हों। [ अंग्रेजीसे ] बॉम्बे क्रॉनिकल, १६-९-१९२७ ४५२. नाली-निरीक्षकको रिपोर्ट सज्जनोंके ओठोंपर दोष भी गुण बन जाते हैं, और दुर्जनोंके ओठोंपर गुण भी दोष; इसमें आश्चर्यकी कोई बात नहीं । मेघ समुद्रका खारा पानी पीकर भी मीठे जलकी वर्षा करते हैं, किन्तु साँप दूध पीकर भी दुःसहतर विष ही उगलते हैं । नदियाँ अपना जल आप नहीं पीतीं; वृक्ष अपने फल आप ही नहीं खाते, और न मेघ ही [ अपने द्वारा सींची हुई ] फसलोंका सेवन करते हैं; सज्जनोंकी सारी विभूति परोपकार के लिए ही होती है । इधर बहुत-से भाइयोंने मुझे पत्र लिखते हुए साथमें कुमारी मेयोकी पुस्तक 'मदर इंडिया' पर छपी समालोचनाओं और विरोधोंकी कतरनें भेजी हैं। कुछने तो कतरनें भेजने के अलावा मुझे पुस्तकपर अपनी राय जाहिर करनेको भी लिखा है। लेखिकाने पुस्तक में मेरे बारेमें जो कुछ लिखा है, उससे लन्दन -निवासी एक भाईके मन में अनेक शंकाएँ उठ खड़ी हुई हैं और उन्होंने गुस्से में भरकर मुझसे उन शंकाओंका समाधान करने को कहा है। खुद कुमारी मेयोने भी मुझे पुस्तककी एक प्रति भेजनेका सौजन्य दिखाया है। इन दिनों में दौरेपर रहा हूँ और निश्चय ही में इस पुस्तकको पढ़नेके लिए समय नहीं निकाल पाता - विशेषकर इसलिए कि मेरी शक्ति सीमित है और कई डाक्टर मित्रोंने मुझे सावधान कर दिया है कि मैं बहुत ज्यादा मेहनत न करूँ। लेकिन, इन पत्रोंके कारण मेरे लिए यह जरूरी हो गया कि पुस्तकको तत्काल पढ़ डालूं । पुस्तक बड़ी चतुराई और काफी सशक्त ढंगसे लिखी गई है। उद्धरण बड़ी सावधानीसे चुने गये हैं और उनकी वजहसे ऐसा लगता है, मानो पुस्तकमें सच्ची बातें ही १. गुणायन्ते दोषाः सुजनवदने दुर्जनमुखे गुणा दोषायन्ते तदिदमपि नो विस्मयपदम् । मद्दा मेघः क्षारं पिबति कुरुते वारि मधुरम् फणी क्षीरं पीत्वा वमति गरलं दुःसहतरम् ॥ पिबन्ति नयः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः । नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः ॥ Gandhi Heritage Portal