५८६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय है । इन लोगोंसे सन्दिग्ध व्यक्तियोंके भेद लेने और तत्कालीन सरकारके गुणोंका बखान करनेवाले ऐसे लेख लिखानेका काम लिया जाता है, मानो ये लेख बिलकुल निष्पक्ष व्यक्तियों द्वारा सरकारको दिये गये प्रमाणपत्र हों। मुझे उम्मीद है कि यदि कुमारी मेयोपर भी कुछ ऐसा सन्देह किया जाये तो वे बुरा नहीं मानेंगी। उन्हें यह जान- कर शायद कुछ सन्तोष मिले कि भारत के कुछ अच्छेसे अच्छे शुभचिन्तकोंपर भी ऐसा सन्देह किया गया है । लेकिन, अगर शंका-सन्देहकी बात छोड़ भी दें तो सवाल यह उठता है कि उन्होंने यह असत्यमय पुस्तक लिखी क्यों । पुस्तक दो तरह से असत्यमय है । एक तो इस तरह कि उन्होंने एक सम्पूर्ण राष्ट्रकी या उन्हींके शब्दोंमें "भारतकी सभी जातियोंकी" ( वे हमें एक राष्ट्र माननेको तो तैयार ही नहीं हैं ) सफाई सम्बन्धी आदतों, नैतिक मूल्यों, धर्म आदिकी लगभग निरपवाद रूपसे निन्दा की है। दूसरे इस तरह कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार में ऐसे-ऐसे गुण बताये हैं जिनको किसी तरह सच्चा सिद्ध नहीं किया जा सकता और जिन गुणोंका श्रेय ब्रिटिश सरकारको देते देखकर बहुत-से ईमानदार सरकारी अधिकारियोंके चेहरे भी शर्म से लाल हो उठेंगे । अगर कुमारी मेयोको अपने इस काम के लिए सरकारसे कुछ प्राप्त न हुआ हो तो कमसे कम इतना तो है ही कि वे भारतकी कट्टर विरोधी और ब्रिटेनकी प्रबल प्रशंसक और पक्षधर हैं। भारतीयोंकी अच्छाइयोंको देखनेसे उनकी नजर इन- कार करती है और अंग्रेजों तथा अंग्रेजी हुकूमतको बुराइयोंकी ओरसे उनकी आँखें बन्द हैं । उनकी पुस्तक पढ़कर पश्चिमवालोंकी निर्णय-बुद्धिके बारेमें कोई ऊँची धारणा नहीं बनती । यद्यपि वे पश्चिमके सनसनी फैलानेवाली चीजें लिखनेवाले लेखकोंके वर्गका प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन में अपने इस विश्वाससे संतोष प्राप्त करता हूँ कि इस वर्गके लेखकोंका जोर अब घट रहा है। अमेरिकामें ऐसे पाठकोंकी संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है जो सनसनी फैलानेवाली, बाहरसे भड़कदार दिखनेवाली या छद्मपूर्ण रचनाओंको पसन्द नहीं करते। मगर दुःखकी बात यह है कि अभीतक पश्चिम में ऐसे हजारों लोग हैं जिन्हें इन सस्ते साधनोंसे सनसनी और उत्तेजना प्राप्त करनेमें बड़ा मजा आता है। इसके अलावा, लेखिका द्वारा दिये गये सभी उद्धरण और सन्दर्भ- विच्छिन्न तथ्य भी सही नहीं हैं । यहाँ मैं उन्हींकी चर्चा करूँगा, जिनके बारेमें मुझे निजी तौरपर कुछ मालूम है । यह पुस्तक सन्दर्भ-विच्छिन्न उद्धरणों और ऐसे लेखांशोंसे भरी पड़ी है, जिनकी प्रामाणिकताको अधिकृत तौरपर चुनौती दी गई है । लेकिन बाल-विवाहके साथ कविगुरु (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) का नाम संयुक्त करके वे औचित्य और शिष्टताकी सभी सीमाएँ लाँघ गई हैं । यह सच है कि कविगुरुने कम उम्र में विवाह करनेकी प्रथाके बारेमें कहा है कि यह अवांछनीय नहीं है । लेकिन बाल-विवाह और कम उम्र में विवाह करनेकी प्रथामें जमीन-आसमानका अन्तर है । यदि लेखिकाने शान्तिनिकेतन की स्वतन्त्र और स्वातन्त्र्य-प्रिय युवतियों और महिलाओंका परिचय Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६२२
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