५९६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय ज्यामितिक ढंगसे चन्दनका तिलक लगा रखा है । इन चिह्नोंसे जहाँ एक हदतक काफी लाभ हो सकता है, वहाँ इनके पीछे सच्चे धार्मिक जीवनका सम्बल न रहने- पर ये बिलकुल बेकार भी हैं । जहाँतक में जानता हूँ । ये चिह्न आज पहलेकी तरह आन्तरिक जीवनके प्रतिबिम्ब नहीं रह गये हैं । आज तो यही लगता है कि इन चिह्नोंके रूपमें सिर्फ छिलका रह गया है और गूदा, सार सूख गया है। यदि आप 'गीता' को पढ़ें, उसका ठीक उच्चारण करें और व्याकरणके सभी प्रश्नोंके सही जवाब दे दें तो मुझे उतनेसे ही सन्तोष नहीं होगा । जब मैंने आपसे 'भगवद्गीता' पढ़ने को कहा तो मेरा मतलब यह था कि आपको उसकी शिक्षाको अपने व्यक्तिगत जीवन में उतारना चाहिए। कहते हैं, 'भगवद्गीता' के दिव्य लेखकका कहना था कि यह समस्त उपनिषदों, समस्त ज्ञानका सार है और 'गीता' में आप सचमुच इस आशयका एक सुन्दर श्लोक भी देखेंगे कि जो भीतरके सारको छोड़कर सिर्फ बाह्य रूपाकृतिके पीछे पड़ा रहता है वह धूर्त और पाखण्डी है । इसलिए में विद्यार्थियों से कहता हूँ और प्रिंसिपल साहब तथा शिक्षकोंसे भी अनुरोध करता हूँ कि वे ऐसा प्रयत्न करें जिससे इस स्कूल में हिन्दू धर्मके भीतरी मर्म, उसके सारको अभिव्यक्ति मिले; और यदि आप श्रद्धापूर्वक विश्वासके साथ 'भगवद्गीता' का अध्ययन करेंगे तो पायेंगे, और मैंने पाया है, कि हिन्दू-मुस्लिम झगड़े या ब्राह्मण-अब्राह्मण विवादके लिए कोई गुंजाइश नहीं है । आपको 'भगवद्गीता' में अस्पृश्यताके लिए, बाल-वैधव्य और बाल-विवाह के लिए तथा धर्मके नामपर उस वेश्यावृत्तिके लिए, जिस वृत्तिमें आज देवदासियोंके रूपमें हमारी बहनें और बेटियाँ लगी हुई हैं, कहीं कोई आधार नहीं मिलेगा। यदि आप तीसरे अध्यायका ध्यानपूर्वक अध्ययन करेंगे तो उसमें आपको चरखेके पक्ष में भी बहुत-सी बातें मिलेंगी। यदि शिक्षक और इन बच्चोंके माता-पिता ध्यानसे सोचकर देखेंगे तो वे इन सारे बच्चोंको, जिन्हें में अपने सामने देख रहा हूँ, विदेशी वस्त्र नहीं पहनने देंगे। जिस तरह मैंने 'भगवद्गीता' का अध्ययन किया है, अगर आप भी उसी तरह उसका अध्ययन करेंगे तो आपको जीवन के अनेक कष्टोंका सहज उपचार मिल जायेगा । यदि प्रिंसिपल साहब भविष्य में मुझे यह बता सकेंगे कि आप लोगोंने मेरा सुझाव मान लिया है और अब हरएक बालक और बालिका न केवल 'भगवद्गीता' को पढ़ और समझ सकती है, बल्कि उसकी शिक्षा के अनुरूप अपने जीवनको ढालने की भी यथाशक्ति कोशिश कर रही है तो सचमुच मुझे बड़ी खुशी होगी। [ अंग्रेजीसे ] हिन्दू, १६-९-१९२७ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६३२
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