" पत्र : आश्रमकी बहनोंको अथवा सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।। ११५ 'न्यायका नियम यह है कि अपने प्रति कठोरता और प्रतिपक्षीके प्रति उदारता बरती जाये । " गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ७७६८) से । सौजन्य : राधाबहन चौधरी प्यारी बहनो, ७९. पत्र : आश्रमकी बहनों को आश्विन वदी १ [११ अक्टूबर, १९२७] मालूम होता है कि मेरे पिछले पत्रसे तुममें काफी खलबली मची हुई है । इसी- लिए तुम्हारा पत्र मुझे अभीतक नहीं मिला । यह खलबली मुझे पसन्द है। नम्रताके नाते तुम एक-दूसरेके साथ मिलो-जुलो, इतनेसे मुझे सन्तोष नहीं होगा, तुम भी सन्तोष न मानना । हमें एक-दूसरेको जैसे-तैसे नहीं निभा लेना है, बल्कि हार्दिक मेल सिद्ध करना है । हमें अपने आपको, दूसरेको या जगत्को धोखा नहीं देना है । इसलिए जो- कुछ मनमें भरा हुआ हो उसे प्रकट करना चाहिए। एक बार मनमें भरा हुआ मैल निकल जायेगा तो फिर नया भरनेमें देर लगेगी। लेकिन यदि जरा भी मैल रहा तो जैसे मैंले बरतन में डाला हुआ साफ पानी भी मैला हो जाता है, वैसे ही मैले मनमें अच्छे विचार भी मैले बन जाते हैं। जिसके बारेमें हमें एक बार शक हो जाता है, उसकी तमाम बातोंपर हमें शक रहने लगता है । गुजराती (जी० एन० ३६७०) की फोटो नकलसे । बापूके आशीर्वाद १. गीता, २, ३८ । २. वर्षका निश्चय आश्रमकी बहनोंकी आपसी अनबनके उल्लेख से किया गया है; देखिए " पत्र : आश्रमको बहनोंको”, २६-९-१९२७ । Gandhi Heritage Porta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 35.pdf/१४३
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