प्रिय भाई, १०६. पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको कोयम्बटूर २० अक्टूबर, १९२७ आजकल दक्षिण आफ्रिकासे बहुत गर्मागर्म सामग्री आ रही है । यह एक कतरन संलग्न है । जो कुछ हो रहा है मैं उसे देख रहा हूँ लेकिन कुछ न कहने में बुद्धिमानी मानता हूँ । लेकिन आवश्यक होनेपर मैं हस्तक्षेप करनेमें हिचकूंगा नहीं । जो चीज मुझे उद्विग्न करती है वह मणिलालके पत्रका एक अनुच्छेद है जिसे मैं अनुवाद करके नीचे दे रहा हूँ : मैं उनके भाषणोंसे कुछ सन्तुष्ट नहीं हूँ ।" वह साम्राज्यकी तारीफ करने और उससे भारतको होनेवाले लाभ गिनाने में सीमा पार कर जाते हैं। वह इस प्रकार यूरोपीयोंको प्रसन्न करना जरूरी समझते हैं। वह ऐसा मानते प्रतीत होते हैं कि इसी प्रकार हम यहाँ कुछ प्राप्त कर सकेंगे। इन भाषणोंका प्रभाव भारतमें अच्छा नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने मुझसे कहा है कि उन्हें 'इंडियन ओपिनियन' में न छापूं । ८ मुझे लगा कि मणिलालकी यह बात मुझे आपतक पहुँचा देनी चाहिए। क्योंकि वह एक भला लड़का है और वीर लड़का है । साम्राज्य सम्बन्धी मेरे बादके विचारों- को वह जानता है इसलिए मुझे उसके मानसिक रवैयेपर आश्चर्य नहीं है । उसमें यह समझ सकनेकी विवेकबुद्धि नहीं है कि हम और आप सगे भाइयोंके समान हैं, हालाँकि साम्राज्यके सम्बन्धमें एक जैसी राय नहीं रखते । मैंने उसके इस पत्रके बारेमें उससे ज्यादा कुछ नहीं कहा है सिवा इसके कि उसे निष्कर्ष निकालनेमें जल्दबाजीके खिलाफ चेतावनी दी है और यह बताया है कि आप ईमानदारीसे साम्राज्यकी गति- विधियोंको कुल मिलाकर लाभजनक समझते हैं। लेकिन निश्चय ही आप उसे अपने सामने बुलाकर जरूरत हो तो बात करेंगे, उसी प्रकार जिस प्रकार आप अपने बेटेसे करेंगे। मैं पूरी आशा करता हूँ कि यहाँ कुछ अखबारोंमें समय-समयपर जो कुछ छपता रहता है या लोग वहाँ जो कुछ कहते होंगे उसके बारेमें आप परेशान नहीं होंगे । जब आपको लगे कि मुझे कुछ कार्रवाई करनी चाहिए तो कृपया मुझे वैसा सूचित १. श्रीनिवास शास्त्रीने ६ अक्टूबर, १९२७ को प्रिटोरियासे अपने भाईंको एक पत्रमें लिखा था : " साम्राज्य सम्बन्धी अपने विचारोंकी आलोचना होनेकी मुझे पूरी आशा थी। लोगोंको अक्षांश रेखा और देशान्तर रेखा में अन्तर की गुंजाइश रखनी चाहिए। कोई भी सार्वजनिक वक्ता, जिसकी आत्मा मर नहीं गई है, उसे अकसर सत्य छिपानेका अपराध करना ही पड़ेगा । यदि वह साफ झूठ नहीं भी बोलता तो भी यथासंभव उससे मिलती-जुलती बात तो करता ही है। " Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 35.pdf/२०१
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