१७४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय करनेमें हिचकें नहीं । आप तो जानते ही हैं कि मैं अखबारोंको ध्यानसे नहीं पढ़ता, विशेष रूपसे जब मैं प्रतिदिन एक स्थानसे दूसरे स्थानकी यात्रा कर रहा हूँ । भगवान आपको स्वस्थ रखे ! सस्नेह, [[अंग्रेजीसे ] लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री आपका, मो० क० गांधी १०७. पत्र : प्रभावतीको आश्विन कृष्ण १० [२० अक्टूबर, १९२७] चि० प्रभावती, तुमारा पत्र मुझको मील गया था । परंतु अवकाश न होने कारण मैं इससे पहले न लीख सका । तुमको आश्रम भेजनेके बारेमें मेरे सब प्रयत्न अबतक तो निष्फल गये । अब तो मैंने कुछ आशा छोड दी है । चि० मृत्युंजय क्या करेगा उसका भी कुछ पता नहि है । अब तो तुमारे ही बलसे आ सकती है तभी हो सकता है । पिताजीसे बातें करो और कोई उपायसे तुमको भेज सके तो अच्छा है । यदि आश्रम जानेका मौका नहि मीले तो मी अशांत हरगीज न बनो । आश्रममें हम जो श्लोक गाते हैं उसमें एक यह है। दुःखेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृहः वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।।' अथवा तुलसीदासने कहा है : जिनके सम वैभव वा विपदा तुम्हारे पतिका यदि और कुछ पता मीला है तो लीखो । मेरा स्वास्थ्य ठीक रहता है। इस पत्र तुमारे हाथमें आनेके समय मैं मंगलोरके नजदीक हुंगा । २६-३१ मंगलोर नवेम्बर ४-१९ कोलम्बो तीन दिन समुद्रमें जायगे । जी० एन० ३३३० की फोटो नकलसे । १. वर्षका निर्धारण यात्रा कार्यक्रमके आधारपर किया गया है। २. गीता, २, ५६ । ३. रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड | बापूके आशीर्वाद Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 35.pdf/२०२
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